खेती की लागत बढ़ने व मुनाफा कम होने से किसान परेशान

बीज के दर में बढ़ोत्तरी हुई है. ऐसे में किसानों पर बीज का खर्च बढ़ा है.

गोगरी. खेती-किसानी में दिन-प्रतिदिन चुनौती बढ़ती जा रही है. जलवायु परिवर्तन के दौर में मौसम की अनिश्चितता बढ़ी है. बाढ़, सुखाड़, ओलावृष्टि से फसलों का नुकसान बढ़ता जा रहा है. दूसरी तरफ खाद-बीज के दाम बढ़े हैं. मौसम में बदलाव से पंपिंग सेट से सिंचाई करनी पड़ रही है. मजदूरों की कमी से रोपनी, निकाई-गुड़ाई महंगी होती जा रही है. किसानों के पास संसाधन का अभाव है. उन्हें किराए पर कृषि उपकरण लेकर खेती करनी पड़ रही है. कर्ज लेकर खाद-बीज खरीदना पड़ रहा है. उसके बाद भी तैयार फसल को बेचने में पापड़ बेलने पड़ते हैं. धान-गेहूं, मक्का से लेकर दलहन-तेलहन, सब्जी मंडी में बिचौलिए हावी हैं. कर्ज चुकाने के लिए किसान औने-पौने दाम पर फसल बेचने को मजबूर हैं. बदलते मौसम में उन्नत और मौसम अनुकूल बीज का प्रयोग भी किसानों के लिए चुनौती है. बीज के दर में बढ़ोत्तरी हुई है. ऐसे में किसानों पर बीज का खर्च बढ़ा है. सभी किसानों तक सरकारी बीज की पहुंच नहीं है. ऐसे में निजी एजेंसियों से बीज खरीदना किसानों को महंगा पड़ रहा है. गेहूं का 20 किलो का पैकेट 1400 से 1500 रुपये के बीच में आ रहा है. पहले यह 1200 से 1300 में मिल जाता था. सबसे जयादा सब्जी बीज के दाम बढ़े हैं. किसानों को खाद भी समय पर नहीं मिल पाती है. बदलते मौसम में कीट-पतंगे और रोग का प्रकोप बढ़ा है. इनसे फसलों को बचाने के लिए किसानों को कीटनाशक का सहारा लेना पड़ता है. एक फसल में दो से तीन बार छिड़काव करना पड़ता है. यह भी खेती की लागत बढ़ने का प्रमुख कारण है. मजदूर नहीं मिलने से भी संकटगांव में पलायन के चलते खेतिहर मजदूरों का अभाव है. अतिरिक्त कमाई के लिए वे दूसरे राज्य या शहरों का रुख करते हैं. मजदूरों की कमी के चलते किसानों की कृषि यंत्रों पर निर्भरता बढ़ी है. किसान कहते हैं कि निकौनी, रोपनी आदि में मजदूरों की जरूरत होती है तो उन्हें ज्यादा मजदूरी देनी पड़ती है. यही कारण है कि फसल खराब होने की स्थिति में आ जाती है.

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By Rajkishore singh

राजकिशोर सिंह प्रिंट माध्यम में 20 और डिजिटल माध्यम में पिछले 5 वर्षों से पत्रकारिता में एक्टिव हैं. अभी प्रभात खबर के खगड़िया कार्यालय में काम कर रहे हैं. शिक्षा, अनुसंधान, कला-संस्कृति, राजनीति की खबरों में रुचि रखते हैं.

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