थम गयी चरखे की आवाज, बेरोजगार हो गये बुनकर

थम गयी चरखे की आवाज, बेरोजगार हो गये बुनकर हो रहा है बुनकारों का पलायनप्रतिनिधि, गोगरीगांधी के चरखा को विश्व में सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है. गांधी के मार्गदर्शन का असर गोगरी में काफी पड़ा था. एक वक्त था जब गोगरी के खादी भंडार में निर्मित सूती वस्त्र देश के कोने-कोने के अलावे […]

थम गयी चरखे की आवाज, बेरोजगार हो गये बुनकर हो रहा है बुनकारों का पलायनप्रतिनिधि, गोगरीगांधी के चरखा को विश्व में सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है. गांधी के मार्गदर्शन का असर गोगरी में काफी पड़ा था. एक वक्त था जब गोगरी के खादी भंडार में निर्मित सूती वस्त्र देश के कोने-कोने के अलावे विदेश में भी भेजे जाते थे. रजिस्ट्री चौक स्थित खादी भंडार में हजारों बुनकर चरखा चला कर अपना व अपने परिवार का गुजर-बसर करते थे. लेकिन सरकारी सुविधा के अभाव में खादी भंडार के चरखा की आवाज धीरे-धीरे गुम हो गयी. चरखा की आवाज गुम होने के बहुत से कारण है. लेकिन मुख्य वजह है कि चरखा से सूत निकालने के बदले बुनकर को सरकारी स्तर पर बहुत कम राशि दी जाती थी. जिससे मंहगाई की मार झेल रहे मजदूरों के समक्ष भुखमरी की स्थिति उत्पन्न हो गयी. मजदूरों का पलायन अन्य दूसरे प्रदेशों में होने लगा.गोगरी के खादी का था काफी महत्व खादी के देश में गोगरी के खादी की एक अलग पहचान थी. एक समय था कि महीने में सैकड़ों ट्रक खादी देश के कोने-कोने में एक्सपोर्ट किये जाते थे. अनुमंडल क्षेत्र में हजारों बुनकर सूत काट कर अपने परिवार का भरण -पोषण करते थे. गोगरी कस्बा में प्रत्येक घर में हैंडलूम व पावर लूम लगा था. आज भी गोगरी के किसी भी घर में इसके अवशेष मिल जायेंगे. लेकिन बिजली के अभाव व सरकारी सुविधा नदारत रहने के कारण धीरे-धीरे हैंडलूम व पावरलूम बंद हो गये. वार्ड पार्षद हसीबुद्दीन ने बताया कि कुछ वर्ष पूर्व तक यहां हैंडलूम व पावरलूम खूब चलता था. लोग इससे अच्छी खासी कमाई कर लेते थे. सूत का एक्सपोर्ट देश के लुधियाना, चंडीगढ़ , दिल्ली, मुंबई आदि स्थानों में किया जाता था. लेकिन सरकारी सुविधा का अभाव व सूत की कम कीमत मिलने के कारण धंधा धीरे-धीरे बंद करना पड़ा. लोग गोगरी छोड़ कर पलायन करने लगे.समाज कल्याण मंत्री ने किया था खादी भंडार का निरीक्षण तत्कालीन समाज कल्याण मंत्री परवीन अमानुल्लाह ने रजिस्ट्री चौक स्थित खादी भंडार का निरीक्षण किया था. निरीक्षण से क्षेत्र के लोगों को काफी आस जगी थी. निरीक्षण के क्रम में खादी भंडार के भूमि का आकलन, पूर्व में कार्यरत बुनकरों की संख्या, खादी के वस्त्र की गुणवत्ता, खादी के वस्त्र का प्रतिदिन कितना निर्माण होता था इन सभी की जानकारी लिया था. मंत्री ने बहुत जल्द खादी भंडार शुरू किये जाने का आश्वासन दिया था. लेकिन वह आश्वासन भी ठंढे वस्ते में दब कर रह गया.क्षेत्र में उद्योग की है कमीअनुमंडल क्षेत्र में उद्योग -धंधों की काफी कमी है. लेकिन सरकारी उदासीनता व देख-रेख के कारण विकसित लघु उद्योग भी अब मृतप्राय हो चुका है. अगर पुन: खादी उद्योग को बढ़ावा दिया जाय तो कई बेरोजगारों को रोजगार मिल सकेगा.बुनकर कर रहे हैं अन्य कार्य क्षेत्र के हजारों बुनकर बुनाई कार्य में महारथ हासिल करने के बावजूद अपनी कला को कुंठित कर अन्य कार्य में लग गये हैं. आखिर पेट की आग को शांत करने के लिए वे करें भी तो क्या करें? अगर पुन: खादी भंडार के चरखे की चरचराहट होने लगे तो वह दिन दूर नहीं कि वे बुनकर जो इन दिनों परदेश में हैं, गोगरी आकर अपनी कला का जौहर जरूर दिखायेंगे.

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