फसलों को खेतों में नहीं जलाएं किसान पर्यावरण को होता है नुकसान : डीएओ

खगड़िया : फसलों को खेत में जलाने की परंपरा वर्षों से चली आ रही है. रबी हो या खरीफ मौसम. इन दोनों मौसम में किसान अपने खेतों में भूसा, पुआल आदि को खेत से हटाने की जगह उसे खेतों में ही जला देते हैं. शायद किसान इस बात से अंजान हैं कि फसलों को खेत […]

खगड़िया : फसलों को खेत में जलाने की परंपरा वर्षों से चली आ रही है. रबी हो या खरीफ मौसम. इन दोनों मौसम में किसान अपने खेतों में भूसा, पुआल आदि को खेत से हटाने की जगह उसे खेतों में ही जला देते हैं. शायद किसान इस बात से अंजान हैं कि फसलों को खेत में जलाना खतरनाक होता है.

ऐसा करने से न सिर्फ खेतों की उर्वरा शक्ति प्रभावित होती है, बल्कि फसलों से निकलने वाले धुएं जमीन के साथ-साथ मानव स्वास्थ्य व पर्यावरण के लिये भी यह हानिकारक है. खेतों में फसलों के जलाने की वर्षों पुरानी प्रथा को समाप्त करने के लिये कृषि विभाग के द्वारा विशेष जागरूकता कार्यक्रम चलाया गया है. जिला कृषि पदाधिकारी दिनकर प्रसाद सिंह ने कहा कहा कि इस कार्यक्रम के तहत जिले के तमाम किसानों को फसल जलाने से होने वाले नुकसान की जानकारी के साथ-साथ अवशेष/बेकार फसलों का इस्तेमाल उर्वरक बनाने में करने को कहा जायेगा.
गौरतलब है कि खरीफ फसल में बड़ी संख्या में जिले के किसान धान व मक्के की कटनी के बाद अक्तूबर-नवम्बर माह में धान के पुआल व मक्के के पौधे को खेत में जला देते हैं. इसी तरह रबी मौसम में गेहूं व मक्के की कटनी के बाद अप्रैल व जून माह में गेहूं के भूसे व मक्के के पौधों को जलाते हैं. डीएओ बताते हैं कि अब बेकार फसलों को खेतों में जलाने से रोकने के लिये किसानों को जागरुक किया जायेगा.
जागरूकता के लिए राज्यस्तर पर होगा कार्यक्रम. खेतों में फसलों के अवशेष को जलाने से रोकने सहित इससे होने वाले नुकसान की जानकारी किसानों एवं आमलोगों तक पहुंचाने के लिये राज्य स्तर से कार्यक्रम चलाया गया है.
जिसमें कृषि विभाग, सहकारिता विभाग, वन एवं पर्यावरण, स्वास्थ्य विभाग, शिक्षा विभाग, ग्रामीण विकास विभाग, पशु एवं मत्स्य विभाग, पंचायती राज विभाग तथा सूचना एवं जन-सम्पर्क विभाग शामिल है. इन सभी विभागों के अफसर अपने-अपने अधीनस्थ कर्मियों के जरीये किसानों को जागरूक करेंगे तथा ये बतायेंगे कि फसलों को जलाने से क्या-क्या नुकसान होते हैं.
कृषि विभाग पदाधिकारी/कर्मी पंचायत स्तर पर चौपाल लगाकर तथा अन्य कार्यक्रमों के जरीये फसल का अवशेष (खुट्टी, पुआल, भूसा आदि) जलाने से मिट्टी,स्वास्थ्य व पर्यावरण पर पड़ने वाले बुरे प्रभाव की जानकारी देंगे. जिले के अधिक से अधिक किसानों को आत्मा व कृषि विज्ञान केंद्र के माध्यम से प्रशिक्षित किया जायेगा. फसल अवशेष को जलाने की जगह खेत की साफ के लिये बेलर मशीन का प्रयोग करने, वर्मी कम्पोस्ट बनाने के लिये किसानों को प्रेरित किया जायेगा.
वहीं वन एवं पर्यावरण विभाग के द्वारा भी किसानों को जागरूक किया जायेगा. विभागीय पदाधिकारी यह बतायेंगे कि खेतों में फसल जलाने से वायुमंडल में कार्बन-डाई-ऑक्साईड, कार्बन मोनो ऑक्साईड तथा भोलाटाइल ऑर्गेनिक की मात्रा बढ़ जाती है, जिससे वातावरण प्रदूषित हो जाता है. जो जलवायु परिवर्तन का एक कारक हो सकता है. स्वास्थ्य कर्मी यानी एएनम एवं आशा कार्यकर्ता भी गांवों में घूम-घूम कर लोगों को फसल जलाने से मना करेंगे.

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