कटिहार से सूरज कुमार गुप्ता की रिपोर्ट
Rajesh Ram: बिहार की सियासत और विशेषकर सीमांचल के राजनीतिक गलियारों में इन दिनों हलचल तेज है. बिहार प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष राजेश राम इन दिनों अपने पहले संगठनात्मक सीमांचल दौरे पर हैं. सोमवार को अररिया से अपने इस अहम अभियान की शुरुआत करने के बाद, वे किशनगंज और पूर्णिया के रास्ते होते हुए बुधवार 03 जून की शाम कटिहार पहुंचेंगे. प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद सांगठनिक तौर पर राजेश राम का यह पहला कटिहार आगमन है, जिसे लेकर स्थानीय नेताओं और जमीनी कार्यकर्ताओं में भारी उत्साह देखा जा रहा है. उनके स्वागत और संवाद कार्यक्रम को लेकर कटिहार कांग्रेस कार्यालय सहित विभिन्न प्रखंडों में व्यापक तैयारियां की जा रही हैं.
अंतर्कलह और गुटबाजी को दूर करना सबसे बड़ी चुनौती
कांग्रेस अध्यक्ष के इस दौरे के राजनीतिक निहितार्थ और पार्टी के भीतर की जमीनी हकीकत को निम्नलिखित बिंदुओं के माध्यम से समझा जा सकता है:
- गुटों में बंटा संगठन: राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, बिहार कांग्रेस इन दिनों गंभीर आंतरिक कलह (अंतर्कलह) के दौर से गुजर रही है. कटिहार समेत पूरे सीमांचल में कांग्रेस के नेता कई धड़ों और गुटों में बंटे नजर आते हैं. ऐसे में सभी नाराज और अलग-थलग पड़े धड़ों को एक मंच पर लाकर संगठन को ‘ग्रास रूट’ (बूथ स्तर) पर खड़ा करना नए अध्यक्ष के सामने सबसे बड़ी चुनौती है.
- केंद्रीय नेतृत्व की अनदेखी: हालिया राज्यसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस के कुछ विधायकों द्वारा पार्टी लाइन और सिद्धांतों के विरुद्ध जाकर किए गए मतदान ने बिहार कांग्रेस की अनुशासनहीनता की कलई खोल दी थी. इस घटना ने पार्टी के भीतर नेतृत्व के संकट और केंद्रीय आलाकमान की कथित उदासीनता को लेकर कई तरह के सवालों को जन्म दे दिया है.
विडंबना: पिछले 7-8 सालों से बिहार में नहीं बनी पूर्णकालिक कमेटी
संगठन का संकट: बिहार के राजनैतिक इतिहास में यह बात बेहद चौंकाने वाली है कि देश की मुख्य विपक्षी पार्टी होने के बावजूद कांग्रेस पिछले 7 से 8 वर्षों में बिहार में एक मुकम्मल ‘प्रदेश कांग्रेस कमेटी’ (Full-fledged State Committee) का गठन नहीं कर पाई है. राजनीतिक जानकारों की मानें तो केंद्रीय नेतृत्व की प्राथमिकताओं में बिहार संगठन का मजबूत होना शायद शीर्ष पर नहीं रहा, जिसके कारण राज्य में जिला से लेकर ब्लॉक स्तर तक तदर्थ (अस्थायी) व्यवस्था के सहारे ही राजनीति की जा रही है.
कांग्रेस का मजबूत गढ़ रहा है सीमांचल, खोई जमीन पाने की जद्दोजहद
बूथ स्तर की मजबूती पर जोर:
गौरतलब है कि सीमांचल का पूरा इलाका (कटिहार, पूर्णिया, अररिया और किशनगंज) ऐतिहासिक रूप से कांग्रेस का मजबूत गढ़ माना जाता रहा है. यहाँ पार्टी का कैडर और पुराने कार्यकर्ताओं का जनाधार आज भी मौजूद है. परंतु, पिछले कुछ चुनावों में स्थानीय स्तर पर टिकट वितरण में विसंगतियों, भाई-भतीजावाद और पद लोलुपता के कारण समर्पित कार्यकर्ता हाशिये पर चले गए. हाल ही में कटिहार में हुई संगठनात्मक बैठकों में पार्टी को बूथ स्तर तक पुनर्जीवित करने पर सहमति तो बनी है, लेकिन कार्यकर्ताओं का साफ कहना है कि जब तक शीर्ष स्तर के नेता अपनी आपसी रंजिश नहीं छोड़ेंगे, तब तक संगठन विस्तार का लक्ष्य महज कागजी खानापूर्ति बनकर रह जाएगा.
जिम्मेदारी तय किए बिना नहीं सुधरेगी पार्टी की दशा
भविष्य की राह और सियासी संदेश:
सीमांचल के इस दौरे के जरिए राजेश राम कार्यकर्ताओं को एकजुट कर एक नई ऊर्जा फूंकने का प्रयास कर रहे हैं. हालांकि, कई वरिष्ठ राजनैतिक विश्लेषकों का मानना है कि केवल दौरों और भाषणों से स्थितियां नहीं बदलेंगी. कांग्रेस को यदि आगामी विधानसभा चुनावों में अपनी प्रासंगिकता बचानी है, तो उसे अपनी कार्ययोजना में कड़ा रुख अपनाना होगा, गुटबाजी करने वाले नेताओं पर लगाम कसनी होगी और हर स्तर पर पदाधिकारियों की जवाबदेही तय करनी पड़ेगी. बहरहाल, अब 3 जून को कटिहार में होने वाले इस संवाद कार्यक्रम पर पूरे जिले की निगाहें टिकी हैं कि राजेश राम कांग्रेस की इस डूबती नैया को पार लगाने के लिए क्या संजीवनी दे पाते हैं.
