एक जमीन, दो रसीद, कोढ़ा अंचल में लाल कार्डधारी की जमीन पर बड़ा गड़बड़झाला
बिहार सरकार की महत्वाकांक्षी लाल कार्ड योजना के तहत गरीब परिवार को दी गयी जमीन पर ही सरकारी रिकॉर्ड में बड़ा खेल उजागर हुआ है.
गरीब को मिला हक छिना, अंचल की लापरवाही या सुनियोजित गड़बड़ी, जांच की उठी मांग
कोढ़ा. कोढ़ा अंचल से जुड़ा एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जहां बिहार सरकार की महत्वाकांक्षी लाल कार्ड योजना के तहत गरीब परिवार को दी गयी जमीन पर ही सरकारी रिकॉर्ड में बड़ा खेल उजागर हुआ है. एक ही समय में दो अलग-अलग व्यक्तियों के नाम से रसीद कट रही है. लाल कार्डधारी विजय महलदार ने बताया कि वर्ष 2004 में बिहार सरकार द्वारा उन्हें 72 डिसमिल जमीन उपलब्ध करायी गयी थी. यह जमीन उनके जैसे गरीब परिवार के लिए जीवन का सहारा बनी. इसी जमीन पर वे खेती कर अपने परिवार का भरण-पोषण करते आ रहे हैं. वर्ष 2014 से वे नियमित रूप से इस जमीन का रसीद कटवाते आ रहे हैं, जो वर्तमान में 2026 तक अपडेट है, लेकिन हैरानी की बात यह है कि वर्ष 2017 से इसी जमीन की रसीद एक अन्य व्यक्ति सुदामा कुमार चौधरी के नाम से भी कटने लगी, यानी एक ही खेसरा और एक ही रकबा 72 डिसमिल दो अलग-अलग लोगों के नाम पर सरकारी रसीद यह न केवल नियमों का खुला उल्लंघन है, बल्कि प्रशासनिक लापरवाही का गंभीर उदाहरण भी है.जब इस गड़बड़ी को लेकर पीड़ित विजय महलदार अंचल कार्यालय पहुंचा और अंचल पदाधिकारी व कर्मचारियों से शिकायत की, तो उन्हें परिमार्जन कराइए कहकर टाल दिया गया. पीड़ित के अनुसार, परिमार्जन की प्रक्रिया के दौरान अंचल नाजिर को छह रुपये भी देने पड़े. इसके बावजूद समस्या का समाधान नहीं हुआ. परिमार्जन के बाद अंचल कर्मियों ने यह कहकर पल्ला झाड़ लिया कि पुरानी जमाबंदी के आधार पर अब रसीद कटेगी. सवाल यह उठता है कि क्या एक ही जमीन पर दो व्यक्तियों को मालिक मानकर रसीद काटना कानूनन सही है. अगर नहीं, तो इसके लिए जिम्मेदार कौन है. इस पूरे मामले को लेकर जब प्रभात खबर संवाददाता ने अंचल पदाधिकारी संजीव कुमार से सवाल किया, तो उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि लाल कार्डधारी की जमीन को लेकर अभी हम कुछ नहीं कह सकते. उनका यह बयान न केवल पीड़ित को निराश करने वाला है, बल्कि प्रशासन की संवेदनहीनता को भी उजागर करता है. पीड़ित विजय महलदार अंचल कार्यालय के चक्कर काट-काटकर थक चुके हैं, लेकिन अब तक उन्हें न्याय नहीं मिला है.
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