400 सालों से बांग्ला पद्धति से देवी कैरी हो रही अर्चना

बौंसी : के प्राचीनतम देवी मंडपों में से एक देवी कैरी दुर्गा मंदिर का इतिहास 400 साल पुराना है. इस मंदिर की ख्याति इतनी है कि बिहार ही नहीं पड़ोसी राज्य झारखंड व बंगाल से यहां लोग बंगला पद्धति से पूजा करने आते हैं. देवी कैरी में दस दिनों तक बंगला पद्धति से ही पूजा […]

बौंसी : के प्राचीनतम देवी मंडपों में से एक देवी कैरी दुर्गा मंदिर का इतिहास 400 साल पुराना है. इस मंदिर की ख्याति इतनी है कि बिहार ही नहीं पड़ोसी राज्य झारखंड व बंगाल से यहां लोग बंगला पद्धति से पूजा करने आते हैं. देवी कैरी में दस दिनों तक बंगला पद्धति से ही पूजा होती रहती है. जानकार बताते हैं कि मंदिर का इतिहास बता पाना मुश्किल है. वर्तमान मेढ़पति उगेंद्र नारायण दत्त के अनुसार, उनकी 7 पीढ़ियों को भी नहीं पता है कि मंदिर का निर्माण कब और कैसे किया गया था.

जबकि बुजुर्गों का कहना है कि पहले यहां मिट्टी व फूस से बना झोपड़ी नुमा मंदिर था. जिसे 70 के दशक में पक्का का बनवाया गया है. मंदिर की स्थापना कायस्थ समाज के लोगों द्वारा की गयी है. आज भी यहां मंदिर के रंगरोगन से लेकर पूजा पाठ में सालों भर खर्च होने वाली राशि का वहन मेढ़पति परिवार के लोग करते हैं. इसके लिए कहीं से किसी भी प्रकार का चंदा नहीं लिया जाता है. इस गांव में जाने के लिए सड़क तक नहीं है. कच्ची सड़क से होकर श्रद्धालु मंदिर तक आते हैं और पूजा कर वापस लौट जाते हैं.

इस तरह होता है पूजन
जिउतिया के दूसरे दिन कलश स्थापना के साथ पूजा की शुरुआत होती है इसी दिन से यहां चंडी पाठ भी प्रारंभ हो जाता है. मंदिर के पूजारी कहते हैं कि कलश स्थापना के दिन को बोधन पूजा भी कहते हैं. इस दिन एक पाठे की बलि दी जाती है.
चार पूजा को बलि के बाद 6 पूजा को अधिवाश पूजा, सात को चक्षु दान व बलि होती है, आठ पूजा को सार्वजनिक रुप से श्रद्धालु भगवती को डलिया चढ़ाते हैं. सप्तमी एवं दशवी पूजा को 108 बेलपत्र की पूर्णाहूति हवन कुंड में जबकि अष्टमी को 4 हजार और नवमी को 6 हजार बेलपत्र की पूर्णाहूति हवन कुंड में दी जाती है. दशवीं को विषर्जन के बाद एकादशी को खीर का भोग लगाया जाता है.
देवी पुराण में हैं मंदिर का जिक्र
यहां के कई जानकारों का कहना है कि देवी पुराण के नवमें स्कंद में बताया गया है कि मंदराचल पर्वत से दो वर्ग किमी की दूरी पर चार भुजा वाली माता योगमाया का मंदिर है. वह मंदिर देवी कैरी का ही मंदिर है. पूर्वजों के अनुसार, लक्ष्मीपुर स्टेट के राजा प्रताप नारायण सिंह द्वारा यहां नवमीं को सरकारी पूजा आरंभ करायी गयी थी. इसका सारा खर्च राजा स्वयं वहन करते थे. इस अवसर पर मंदिर प्रांगण के ठीक सामने दो दिनों का विशाल मेला लगता है.

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