Kaimur News: (रामपुर से राजू कुमार की रिपोर्ट) :
प्रखंड क्षेत्र अंतर्गत अहिराव गांव में कृषि और मिट्टी की सेहत सुधारने के संकल्प के साथ ‘खेत बचाओ अभियान’ के तहत बुधवार को कृषि विभाग के पदाधिकारियों ने स्थानीय किसानों के साथ एक महत्वपूर्ण बैठक की. इस गोष्ठी के दौरान उपस्थित किसानों को रासायनिक खादों के अंधाधुंध प्रयोग से होने वाले दुष्प्रभावों और जैविक खेती से मिलने वाले दीर्घकालिक फायदों के बारे में विस्तार से जानकारी दी गई. बैठक को मुख्य रूप से संबोधित करते हुए आत्मा के एटीएम अमन कुमार ने उपस्थित सभी किसानों से पुरजोर अपील की कि वे अपनी खेती में रासायनिक खादों का अत्यधिक छिड़काव तुरंत कम करें.
प्राकृतिक उर्वरा शक्ति तेजी से घट रही
उन्होंने वैज्ञानिक तथ्यों का हवाला देते हुए समझाया कि इन कृत्रिम खादों के लगातार इस्तेमाल से हमारे खेतों की प्राकृतिक उर्वरा शक्ति तेजी से घट रही है, जिसका सीधा बुरा असर आने वाले समय में फसल उत्पादन पर पड़ना तय है. उन्होंने किसानों को कड़े शब्दों में चेताया कि यदि रासायनिक खादों के उपयोग पर जल्द ही नियंत्रण नहीं पाया गया, तो एक दिन ऐसा भी समय आ सकता है जब हमारी उपजाऊ भूमि पूरी तरह बंजर हो जाएगी.
मिट्टी की जांच समय-समय पर कराना जरूरी
अमन कुमार ने आगे कहा कि भविष्य में ऐसी भयावह स्थिति पैदा न हो, इसके लिए किसानों को अब जागरूक होना होगा और अपनी जरूरत के अनुसार खेतों में जैविक खाद (कम्पोस्ट या केंचुआ खाद) का उपयोग बढ़ाना होगा क्योंकि जैविक खाद से खेतों की उर्वरा शक्ति हमेशा के लिए बनी रहती है और फसल की गुणवत्ता भी बेहतरीन होती है. उन्होंने किसानों को एक बेहतर तकनीकी सलाह देते हुए कहा कि वे समय-समय पर अपने खेतों की मिट्टी की जांच (सोइल टेस्टिंग) सरकारी लैब में अवश्य कराते रहें.
मिट्टी की वैज्ञानिक जांच के बाद भूमि में जिस विशेष पोषक तत्व की कमी पाई जाए, केवल उसी का निर्धारित मात्रा में छिड़काव करें. किसी भी उर्वरक या दवा के छिड़काव से पहले किसान भाई कृषि विभाग के स्थानीय पदाधिकारियों से संपर्क कर यह सटीक जानकारी जरूर ले लें कि किस अनुपात में और कौन सी खाद का प्रयोग करना है, जिससे फसल और पैसे दोनों का नुकसान होने से बच सके.
खेतों में पराली जलाने वाले किसानों से की गई अपील
इसी बैठक में कृषि पदाधिकारियों ने क्षेत्र में पर्यावरण और खेती के लिए बड़ी समस्या बन चुकी पराली (फसल अवशेष) को खेतों में न जलाने की किसानों से विशेष अपील की. अधिकारियों ने इसके पीछे का मुख्य वैज्ञानिक कारण बताते हुए कहा कि खेतों में पराली जलाने से अत्यधिक उच्च तापमान के कारण किसानों के सच्चे मित्र कहे जाने वाले केंचुए और अन्य छोटे मित्र कीट झुलसकर मर जाते हैं, जिससे मिट्टी का प्राकृतिक चक्र टूट जाता है और फसल उत्पादन बुरी तरह प्रभावित होता है.
अवशेषों को जलाने की जगह पानी और दवाओं से करें नष्ट
इसके अलावा, पराली से निकलने वाले जहरीले और घने धुएं से ग्रामीण क्षेत्रों का पूरा वातावरण दूषित हो जाता है, जो मानव स्वास्थ्य के लिए खतरनाक है. अधिकारियों ने किसानों को एक बेहतर विकल्प सुझाते हुए कहा कि अगर फसल के बचे हुए अवशेष को जलाने के बजाय खेतों में ही पानी और दवाओं की मदद से सड़ा-गला दिया जाए, तो वह प्राकृतिक रूप से बेहतरीन जैविक खाद का काम करता है. ऐसा करने से किसानों को बाजार से महंगी उर्वरक खरीदने की जरूरत बहुत कम पड़ेगी और खेतों में लागत घटने के साथ ही फसल की पैदावार भी बंपर होगी. इस महत्वपूर्ण और ज्ञानवर्धक कृषि चौपाल में क्षेत्र के दर्जनों प्रगतिशील किसानों के साथ कृषि विभाग के कई तकनीकी कर्मी और सलाहकार मुख्य रूप से उपस्थित रहे.
