Kaimur News : रामपुर प्रखंड के नौहट्टा स्थित सत्संग आश्रम बालेश्वर घाट में बुधवार को गुरु पूर्णिमा का पर्व पूरे श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया गया. हर साल की तरह इस बार भी आश्रम परिसर में भजन-कीर्तन, सत्संग और विशाल भंडारे का आयोजन हुआ, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने भाग लिया. सुबह से ही आश्रम में भक्तों की भीड़ जुटने लगी थी और पूरे दिन माहौल भक्तिमय बना रहा.
गुरु पूर्णिमा के मौके पर सिर्फ स्थानीय लोग ही नहीं, बल्कि जिले के अलग-अलग क्षेत्रों और बाहर से भी संत महात्मा और श्रद्धालु यहां पहुंचे. आश्रम परिसर में भक्तों की भीड़ और धार्मिक कार्यक्रमों ने पूरे इलाके को आध्यात्मिक रंग में रंग दिया.
भजन-कीर्तन से गूंजा आश्रम परिसर
कार्यक्रम की शुरुआत सुबह से ही भजन-कीर्तन और सत्संग के साथ हुई. संत महात्माओं ने अपने प्रवचनों में गुरु-शिष्य परंपरा के महत्व को बताया और जीवन में गुरु के स्थान को समझाया. भक्ति गीतों और भजनों की गूंज से पूरा आश्रम परिसर भक्तिमय हो गया.
श्रद्धालु भी पूरे मन से भजन-कीर्तन में शामिल हुए और वातावरण में एक अलग ही शांति और सकारात्मक ऊर्जा देखने को मिली. लोगों ने कहा कि ऐसे आयोजनों से मन को सुकून मिलता है और आध्यात्मिक जुड़ाव बढ़ता है.
भंडारे में श्रद्धालुओं ने ग्रहण किया प्रसाद
धार्मिक कार्यक्रमों के बाद विशाल भंडारे का आयोजन किया गया. इसमें संत महात्माओं के साथ-साथ दूर-दराज से आए श्रद्धालुओं ने भी प्रसाद ग्रहण किया. भंडारे में लोगों की लंबी कतारें देखने को मिलीं और सभी ने सेवा भाव के साथ इसमें भाग लिया.
आयोजकों ने बताया कि हर साल गुरु पूर्णिमा पर इस तरह का भंडारा आयोजित किया जाता है, जिसमें सभी वर्ग के लोग एक साथ बैठकर प्रसाद ग्रहण करते हैं. यह आयोजन सामाजिक समरसता का भी संदेश देता है.
समाधि स्थल पर विशेष पूजा-अर्चना
गुरु पूर्णिमा के अवसर पर आश्रम में समाधि लिए पूर्व संत महात्माओं के तैल चित्रों और समाधि स्थल पर विशेष पूजा-अर्चना की गई. श्रद्धालुओं ने वहां फूल-माला और अंगवस्त्र अर्पित कर अपने गुरुजनों को नमन किया.
इस दौरान महात्मा शंकरानंद, महात्मा रामेश्वरानंद, महात्मा विवेकानंद, सुनील सिंह, धर्मपाल सिंह, उमाकांत चंद्रवंशी, वीरेंद्र पासवान समेत सैकड़ों श्रद्धालु मौजूद रहे. सभी ने श्रद्धा के साथ कार्यक्रम में भाग लिया.
गुरु-शिष्य परंपरा का दिया संदेश
आयोजकों ने बताया कि गुरु पूर्णिमा का पर्व गुरु-शिष्य परंपरा की महत्ता को समझाने का अवसर होता है. इसी भावना के साथ हर वर्ष यहां श्रद्धालु एकत्र होकर अपने गुरुजनों को याद करते हैं और उनसे प्रेरणा लेते हैं.
