जमुई जिले के खैरा प्रखंड के दक्षिणी इलाकों को जिला और प्रखंड मुख्यालय से जोड़ने वाला ललदैया कॉजवे क्षतिग्रस्त होने के बाद बंद कर दिया गया है. किऊल नदी पर बने इस पुराने कॉजवे के बीच का हिस्सा 25 अगस्त की रात किसी भारी वाहन के गुजरने के बाद धंस गया. इसके बाद स्लैब में दरार आ गयी और कॉजवे का फाउंडेशन भी बैठ गया. पथ निर्माण विभाग ने इसे वाहनों के लिए असुरक्षित मानते हुए तत्काल परिचालन रोक दिया है. खास बात यह है कि करीब 14 साल पहले भी यह कॉजवे नक्सलियों के निशाने पर आ चुका है.
भारी वाहन के दबाव से बैठ गया कॉजवे का हिस्सा
डीएम श्री नवीन के अनुसार क्षतिग्रस्त कॉजवे जमुई-कौआकोल पथ यानी एसएच-82 के किलोमीटर 14.600 पर स्थित है. 25 अगस्त 2026 को किसी अज्ञात भारी वाहन के गुजरने के कारण कॉजवे पर अत्यधिक दबाव पड़ा. इससे उसका फाउंडेशन बैठ गया और स्लैब में दरार आ गयी.
पथ निर्माण विभाग ने कॉजवे की मौजूदा स्थिति को देखते हुए सभी प्रकार के वाहनों का परिचालन रोक दिया है. विभाग के अनुसार करीब 20 वर्ष पुराना यह कॉजवे पहले से ही जर्जर और शीर्ण अवस्था में था. ऐसे में सुरक्षा को देखते हुए इस पर वाहनों की आवाजाही रोकना जरूरी हो गया.
खैरा-जमुई से गरही जाने वालों के लिए नया रूट
कॉजवे बंद होने के बाद प्रशासन ने वाहनों के आवागमन के लिए वैकल्पिक मार्ग निर्धारित किया है. खैरा-जमुई की ओर से आने वाले वाहन बड़ीबाग, भीमाइन और ललदैया होते हुए गरही की ओर जायेंगे. वहीं गरही-कौआकोल की ओर से आने वाले वाहन ललदैया, भीमाइन और बड़ीबाग होते हुए खैरा-जमुई की ओर जा सकेंगे.
इस बीच राहत की बात यह है कि कॉजवे के समानांतर बिहार राज्य सड़क विकास निगम लिमिटेड की ओर से उच्चस्तरीय पुल का निर्माण कराया जा रहा है. विभाग के अनुसार नये पुल का संरचनात्मक काम लगभग पूरा हो चुका है और करीब दो महीने के भीतर इसका निर्माण पूरा होने की उम्मीद है.
2012 में नक्सलियों ने डायनामाइट से उड़ाने की कोशिश की थी
ललदैया कॉजवे का इतिहास भी काफी घटनापूर्ण रहा है. वर्ष 2012 में बिहार दिवस यानी 21 मार्च के दिन नक्सलियों ने इसे निशाना बनाया था. कॉजवे के एक पाए में डायनामाइट लगाकर विस्फोट किया गया था. विस्फोट में पाया बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया था. बाद में इसकी मरम्मत कराकर आवागमन बहाल किया गया.
इसी दौर में खैरा प्रखंड कार्यालय, खैरा पावर सब स्टेशन और बालू घाट पर बालू लोड कर रहे 13 ट्रकों को भी नक्सलियों द्वारा आग के हवाले किये जाने की घटनाएं सामने आयी थीं. मरम्मत के बाद कॉजवे पर चेतावनी बोर्ड लगाकर भारी वाहनों के परिचालन पर रोक की जानकारी दी गयी थी. इसके बावजूद वर्षों तक यह पुराना कॉजवे लोगों की आवाजाही का महत्वपूर्ण जरिया बना रहा.
गरही डैम के बाद सामने आयी थी कॉजवे की जरूरत
स्थानीय लोगों के अनुसार गरही डैम के निर्माण के समय स्पिलवे बनाये जाने का ग्रामीणों ने विरोध किया था. उनका कहना था कि बारिश के दिनों में नाव से किऊल नदी पार करनी पड़ती है, जबकि पानी कम होने पर लोग नदी में वाहन उतारकर दूसरी तरफ जाते हैं.
ग्रामीणों ने आशंका जतायी थी कि स्पिलवे बनने के बाद सालभर पानी रहने की स्थिति में आवागमन मुश्किल हो जायेगा. इसके बाद पुल या कॉजवे निर्माण की मांग उठी और विभागीय स्तर पर कॉजवे को मंजूरी मिली.
वर्ष 2005 के आसपास भी इसके दो वेंट का कुछ काम बाकी था. इसी दौरान गरही डैम में अत्यधिक पानी आने पर स्पिलवे के सभी गेट खोलकर पानी छोड़ा गया, जिसके तेज बहाव में दो वेंट क्षतिग्रस्त हो गये. बाद में उनका पुनर्स्थापन कराया गया और कॉजवे से आवागमन फिर शुरू हुआ.
अब वर्षों पुराने इस कॉजवे के क्षतिग्रस्त होने के बाद नये उच्चस्तरीय पुल पर लोगों की उम्मीदें टिक गयी हैं. करीब दो महीने में नया पुल तैयार होने की विभागीय उम्मीद है. तब तक वैकल्पिक रूट ही दक्षिणी इलाके के लोगों और वाहन चालकों के लिए मुख्य रास्ता रहेगा.
