जमुई के 75 वर्षीय बंगाली मांझी की फिटनेस देख युवा भी हैरान: रोज लगाते हैं 10 किमी की दौड़

बढ़ती उम्र में जहां अधिकांश लोग शारीरिक कमजोरी और बीमारियों से घिर जाते हैं, वहीं जमुई जिले के खैरा प्रखंड के 75 वर्षीय बुजुर्ग बंगाली मांझी अपनी असाधारण फिटनेस और स्टैमिना से आज की युवा पीढ़ी को दांतों तले उंगली दबाने पर मजबूर कर रहे हैं. उनकी अनुशासित दिनचर्या और अद्भुत शारीरिक क्षमता इन दिनों पूरे क्षेत्र में चर्चा और प्रेरणा का विषय बनी हुई है.

बंगाली मांझी साधारण परिवार से ताल्लुक रखते हैं और आर्थिक रूप से कमजोर हैं, लेकिन उनका हौसला और सेहत किसी पेशेवर एथलीट से कम नहीं है. वह हर सुबह मैदान में प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे युवाओं के साथ कंधे से कंधा मिलाकर पसीना बहाते हैं. प्रतिदिन 10 किलोमीटर की कठिन दौड़ और घंटों व्यायाम करना उनकी रोज की दिनचर्या का हिस्सा है.

सुबह 4 बजे उठना और रोजाना 10 किलोमीटर दौड़ना है दिनचर्या

बंगाली मांझी ने अपनी सक्रिय जीवनशैली के बारे में बताते हुए कहा कि वे पिछले तीन वर्षों से बिना रुके एक कड़े रूटीन का पालन कर रहे हैं:

  • कड़ा अभ्यास: वे प्रतिदिन सुबह लगभग चार बजे बिस्तर छोड़ देते हैं और सुबह ठीक छह बजे मैदान में पहुंच जाते हैं.
  • युवाओं को टक्कर: मैदान पर सेना और पुलिस बहाली की तैयारी कर रहे युवाओं के साथ वे दौड़ लगाते हैं. रोज करीब 10 किलोमीटर की दौड़ पूरी करने के बाद वे लगातार दो घंटे तक कठिन शारीरिक व्यायाम (वर्कआउट) भी करते हैं. कई बार दौड़ में वे नौजवानों को भी पीछे छोड़ देते हैं.

वाहन छोड़ अधिकतर पैदल ही तय करते हैं सफर

बंगाली मांझी केवल मैदान तक ही सीमित नहीं हैं, बल्कि वे अपने व्यावहारिक जीवन में भी शारीरिक श्रम को प्राथमिकता देते हैं. उन्होंने बताया कि यदि उन्हें अपने घर से जिला मुख्यालय जमुई या आस-पास के किसी अन्य स्थान पर जाना होता है, तो वे किसी बाइक या गाड़ी का उपयोग करने के बजाय पैदल जाना ही पसंद करते हैं. उनकी इस सक्रियता के कारण शरीर में हमेशा स्फूर्ति और भरपूर ऊर्जा बनी रहती है.

पारंपरिक खानपान और मोटा अनाज है सेहत का असली राज

अपनी मजबूती और निरोग जीवन का श्रेय बंगाली मांझी ने बचपन के खानपान और सादगी को दिया है:

  • पारंपरिक डाइट: उन्होंने बताया कि अपने युवावस्था के दिनों में उन्होंने रागी, मड़ुआ और बाजरे जैसे मोटे अनाजों से बनी रोटियों का सेवन किया था.
  • केमिकल से दूरी: वे अपने पूरे जीवन में रासायनिक खाद और कीटनाशकों से तैयार आधुनिक खाद्य पदार्थों से दूर रहे हैं.
  • सादा जीवन: वर्तमान में वे एक अत्यंत साधारण परिवार से आते हैं, जहां उनका गुजारा मुख्य रूप से सरकार द्वारा मिलने वाले मुफ्त राशन (अनाज) पर होता है. आर्थिक तंगी के कारण महीने-दो महीने में कभी-कभार ही उन्हें मांसाहारी भोजन मिल पाता है.

बंगाली मांझी का मानना है कि यही शुद्ध पारंपरिक खानपान और नियमित शारीरिक मेहनत ही है, जो उन्हें इस उम्र में भी बिना किसी गंभीर बीमारी के चट्टान की तरह मजबूत बनाए हुए है. आज के युवाओं के लिए उनकी यह मेहनत और अनुशासन एक बेहतरीन नजीर बन चुकी है.


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लेखक के बारे में

गुलशन कश्यप प्रिंट माध्यम में 15 और डिजिटल माध्यम में पिछले 5 वर्षों से पत्रकारिता में एक्टिव हैं. सामाजिक सरोकार, शिक्षा, अनुसंधान, राजनीति, कला-संस्कृति व सिनेमा में रुचि रखते हैं.

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