जमुई के मंजोष-भंटा मैग्नेटाइट ब्लॉक की ई-नीलामी प्रक्रिया का कैलेंडर जारी, ग्रामीणों ने जताया विरोध

जमुई के मंजोष-भंटा इलाके में मैग्नेटाइट ब्लॉक की ई-नीलामी की प्रक्रिया शुरू होने वाली है, लेकिन ग्रामीण अपनी उपजाऊ जमीन और सिंचाई के मुख्य स्रोत काला आहर को लेकर चिंतित हैं. सरकार जहां इसे विकास और रोजगार का माध्यम बता रही है, वहीं स्थानीय लोगों का विरोध तेज हो गया है.

Jamui News: जमुई के मंजोष-भंटा इलाके में खनिज संपदा के व्यावसायिक दोहन की तैयारी अब अगले चरण में पहुंच गयी है. राज्य सरकार ने संयुक्त मैग्नेटाइट ब्लॉक की ई-नीलामी के लिए पूरा कैलेंडर जारी कर दिया है. सरकार जहां इसे औद्योगिक निवेश, राजस्व और रोजगार बढ़ाने की दिशा में बड़ा कदम मान रही है, वहीं मंजोष के ग्रामीणों ने इसका विरोध शुरू कर दिया है.

ग्रामीणों की सबसे बड़ी चिंता उनकी उपजाऊ कृषि भूमि और काला आहर को लेकर है. उनका कहना है कि खनन से अगर खेत और सिंचाई का प्रमुख जलस्रोत प्रभावित हुआ, तो इसका असर सिर्फ कुछ परिवारों पर नहीं, बल्कि आसपास के कई गांवों की पूरी कृषि व्यवस्था पर पड़ेगा.

10 सितंबर से शुरू होगी ई-नीलामी की प्रक्रिया

खान एवं भूतत्व विभाग की ओर से जारी ई-नीलामी कैलेंडर के मुताबिक मंजोष-भंटा मैग्नेटाइट ब्लॉक के लिए टेंडर दस्तावेज यानी आरएफपी की उपलब्धता और साइट विजिट के लिए पंजीकरण 10 सितंबर 2026 से शुरू होगा. यह प्रक्रिया तीन दिनों तक चलेगी.

इसके बाद 30 सितंबर को प्री-बिड कॉन्फ्रेंस और साइट विजिट प्रस्तावित है. इच्छुक निवेशकों को तकनीकी और वित्तीय बोलियां 21 अक्टूबर 2026 तक जमा करनी होंगी. वहीं 12 नवंबर 2026 को इलेक्ट्रॉनिक फॉरवर्ड ऑक्शन प्रस्तावित किया गया है.

पूरी ई-नीलामी प्रक्रिया एमएसटीसी ई-ऑक्शन पोर्टल और एमएसटीसी इंजन के माध्यम से संचालित होगी.

सरकार को दिख रहा निवेश और रोजगार का रास्ता

सरकार का उद्देश्य बड़े खनिज संसाधनों के व्यावसायिक दोहन के जरिये बिहार में औद्योगिक निवेश को बढ़ावा देना है. विभाग के अनुसार खनिज ब्लॉकों के व्यावसायिक खनन से राज्य के राजस्व में वृद्धि होगी और स्थानीय स्तर पर कुशल एवं अर्धकुशल रोजगार के अवसर पैदा होंगे.

खनन परियोजना शुरू करने में निवेशकों को जमीन और नियामकीय स्तर पर परेशानी नहीं हो, इसके लिए वन मानचित्रण, इको-सेंसिटिव जोन यानी ईएसजेड का सीमांकन, कैडस्ट्रल डिमार्केशन और भूमि सुविधा से जुड़े कार्य भी किये जा रहे हैं.

लेकिन सरकार की विकास की इस तस्वीर के बीच मंजोष के ग्रामीणों की चिंता बिल्कुल अलग है.

ग्रामीणों का सवाल- विकास की कीमत हमारी जमीन क्यों?

मंजोष के ग्रामीणों का कहना है कि उनका जीवन खेती पर निर्भर है. ऐसे में यदि खनन परियोजना के लिए उपजाऊ कृषि भूमि प्रभावित होती है, तो उनके सामने भविष्य में रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो सकता है.

ग्रामीण चंद्रदेव सिंह, रामाशीष सिंह, विद्यार्थी प्रसाद सिंह, मतीश चंद्र भाष्कर, शुभाकांत सिंह समेत अन्य लोगों का कहना है कि खनिज संपदा का दोहन और औद्योगिक विकास जरूरी हो सकता है, लेकिन इसके साथ स्थानीय लोगों के हितों की सुरक्षा भी जरूरी है.

ग्रामीणों के मुताबिक खेत उनके लिए सिर्फ जमीन का टुकड़ा नहीं हैं. यही उनकी आय, आजीविका और आने वाली पीढ़ियों का आधार हैं.

काला आहर को लेकर क्यों डरे हैं किसान?

मंजोष-भंटा खनन परियोजना को लेकर ग्रामीणों की दूसरी बड़ी चिंता काला आहर है. ग्रामीणों के अनुसार यह जलस्रोत मंजोष सहित आधा दर्जन से अधिक गांवों की सिंचाई का प्रमुख आधार है.

किसानों को आशंका है कि खनन गतिविधियों से काला आहर प्रभावित या खत्म हुआ तो इसका सीधा असर खेती पर पड़ेगा. बड़ी संख्या में किसान सिंचाई के लिए इस जलस्रोत पर निर्भर हैं.

इसी वजह से ग्रामीण काला आहर को इलाके की लाइफलाइन बताते हुए इसके संरक्षण की मांग कर रहे हैं. उनका कहना है कि खनिज संपदा का इस्तेमाल किया जाए, लेकिन खेत, जलस्रोत और पर्यावरण की कीमत पर नहीं.

45 मिलियन टन मैग्नेटाइट का भंडार

जमुई के सिकंदरा प्रखंड में लौह अयस्क के बड़े भंडार मिले हैं. मंजोष में करीब 45 मिलियन टन मैग्नेटाइट लौह अयस्क का भंडार बताया गया है. वहीं भंटा गांव में करीब 6 मिलियन टन लौह अयस्क के भंडार की पुष्टि हुई है.

इसी खनिज संपदा को देखते हुए मंजोष-भंटा ब्लॉक को लेकर सरकार की गतिविधियां तेज हुई हैं. अब ई-नीलामी का कैलेंडर जारी होने के बाद इस परियोजना को लेकर स्थानीय स्तर पर चर्चा और विरोध दोनों बढ़ने की संभावना है.

दो साल पहले भी जमीन अधिग्रहण का हुआ था विरोध

मंजोष में प्रस्तावित खनन को लेकर ग्रामीणों का विरोध नया नहीं है. 26 अप्रैल 2024 को तत्कालीन खनन सचिव धर्मेंद्र सिंह ने मंजोष गांव पहुंचकर प्रस्तावित खनन क्षेत्र का जायजा लिया था.

उस दौरान प्रारंभिक चरण में करीब 85 हेक्टेयर जमीन के अधिग्रहण की जानकारी दी गयी थी. आबादी के कुछ हिस्से के विस्थापन की संभावना भी जतायी गयी थी.

यह जानकारी सामने आने के बाद ग्रामीणों का आक्रोश खुलकर सामने आया था. भूमि अधिग्रहण के लिए किये जा रहे सीमांकन का ग्रामीणों ने विरोध किया था और काम रोक दिया था.

ग्रामीणों ने कहा था- जान दे देंगे, जमीन नहीं

8 मई 2024 को मंजोष में ग्रामीणों की बड़ी बैठक हुई थी. इसमें हजारों लोग शामिल हुए थे. प्रशासन की ओर से तत्कालीन एडीएम, डीडीसी और एसडीएम समेत कई अधिकारी भी पहुंचे थे.

प्रशासन ने ग्रामीणों और अधिकारियों के बीच बने गतिरोध को खत्म करने की कोशिश की, लेकिन ग्रामीण अपनी मांग पर अडिग रहे. उन्होंने स्पष्ट कहा था कि “जान दे देंगे, लेकिन अपनी उपजाऊ जमीन नहीं देंगे.”

अब करीब दो साल बाद ई-नीलामी का कैलेंडर जारी होने के बाद एक बार फिर ग्रामीणों की नजर सरकार और प्रशासन के अगले कदम पर है.

Jamui News: ग्रामीणों की नजर फैसले पर

एक ओर सरकार मंजोष-भंटा के खनिज भंडार को बिहार में औद्योगिक निवेश और रोजगार के अवसर से जोड़कर देख रही है. दूसरी ओर ग्रामीण अपनी खेती, जमीन और काला आहर को बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं.

ऐसे में ई-नीलामी की प्रक्रिया के साथ सबसे बड़ा सवाल यही रहेगा कि खनन परियोजना और स्थानीय किसानों के हितों के बीच संतुलन कैसे बनाया जाएगा. ग्रामीणों की मांग है कि किसी भी अंतिम निर्णय से पहले प्रभावित गांवों के लोगों की आपत्तियां सुनी जाएं और उनकी जमीन, सिंचाई के स्रोत तथा पर्यावरण की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए.

मैग्नेटाइट क्षेत्र का जायजा लेते तत्कालीन खनन सचिव भूमि अधिग्रहण के विरोध में आयोजित बैठक में उपस्थित किसान | Prabhat Khabar Network

Also Read: भागलपुर: नवगछिया के राघोपुर में 22 मजदूरों से भरी नाव पलटी, 20 का रेस्क्यू; 2 की तलाश में SDRF का सर्च ऑपरेशन जारी

Also Read: नेपाल में बाढ़ से बिहार में दहशत, अमित शाह ने किया सम्राट चौधरी को फोन, मांगी पूरी जानकारी


प्रभात खबर डिजिटल टॉप स्टोरी

लेखक के बारे में

By Om Prakash

Digital Media Journalist having more than 2 years of experience in life & Style beat with a good eye for writing across various domains, such as tech and auto beat.
Read More
ePaper

अपने दैनिक समाचार अनुभव को और बेहतरीन बनाएं

सिर्फ ₹399 ₹149

एक साल के लिए

आज ही सब्सक्राइब करें

संबंधित खबरें >

यह भी पढ़ें >