2 मार्च को रात्रि 9: 15 से 11: 45 के मध्य होलिका दहन करना शुभ व शास्त्र सम्मत

दो दिन पूर्णिमा तिथि व चंद्रग्रहण लगने के कारण होलिका दहन को लेकर काफी भ्रांतियां फैली हुई है कि होलिका दहन किस दिन किया जाये.

चकाई. दो दिन पूर्णिमा तिथि व चंद्रग्रहण लगने के कारण होलिका दहन को लेकर काफी भ्रांतियां फैली हुई है कि होलिका दहन किस दिन किया जाये. इस संदर्भ में प्रखंड के विद्वान पंडित अनिल मिश्रा के अनुसार, पूर्णिमा तिथि दो दिन है. 2 और 3 मार्च को, लेकिन 3 मार्च को प्रदोष काल लगने से पहले ही पूर्णिमा तिथि समाप्त हो जा रही है. धर्म सिंधु ग्रंथ के अनुसार, यह कहा गया है कि अगर दोनों दिन पूर्णिमा तिथि लग रही है. अगर पहले दिन पूर्णिमा तिथि में प्रदोष काल का स्पर्श हो रहा है और दूसरे दिन नहीं हो रहा है तो पहले दिन ही भद्रा रहित काल में होलिका दहन कर लेना चाहिए, लेकिन अबकि बार होलिका दहन 2 मार्च को पूर्णिमा के साथ भद्रा का साया भी है, लेकिन शास्त्रों में कहा गया है कि भद्रा मुख का त्याग करके होलिका दहन किया जा सकता है इसलिए भद्रा के मुख को त्याग कर 2 मार्च को रात्रि 9: 15 से 11:45 के मध्य में भद्रा के मुक्त काल में होलिका दहन किया जाना शुभ और शास्त्र सम्मत होगा. इंटरनेट मीडिया पर अपने पोस्ट के जरिए चर्चित अनिल मिश्रा ने बताया कि दिनांक 3 मार्च दिन मंगलवार को भी पूर्णिमा तिथि संध्या 4:29 तक रह रही है इसलिए दिनांक 4 मार्च दिन बुधवार को वसंतोत्सव, रंगोत्सव का त्योहार होली मनाया जाना श्रेयस्कर है.

होलिका दहन का महत्व

अनिल मिश्रा ने कहा कि यह पर्व सिर्फ रंगोत्सव नहीं बल्कि यह बुराई पर अच्छाई की जीत का पर्व है. इस दिन एक हिरण्यकश्यप नामक शक्तिशाली असुर था. उसने अपनी घोर तपस्या से ब्रह्माजी को प्रसन्न कर उनसे विशेष वरदान प्राप्त किया था कि मुझे न कोई मनुष्य मार सके, न कोई पशु, न अंदर मारा जा सकू, न बाहर, न दिन में मारा जा सकूं, न रात में ने किसी अस्त्र शस्त्र से भी मेरी मृत्यु हो. ब्रह्मा जी ने उसे यह वरदान दे दिया और वह स्वयं को ही भगवान समझने लगा. वह अपने राज्य में किसी को भी भगवान की पूजा नहीं करने देता था, लेकिन उसका पुत्र प्रह्लाद भगवान विष्णु का बहुत बड़ा भक्त था. उसे सबक सिखाने के लिए उसने अपनी बहन को होलिका को अपने पुत्र को लेकर अग्नि में बैठने के लिए कहा. होलिका को वरदान प्राप्त था कि वह अग्नि से नहीं जलेगी, लेकिन उस दिन ऐसा नहीं हुआ भगवान विष्णु ने अपने भक्त प्रह्लाद की रक्षा की और होलिका अग्नि में जलकर राख हो गयी. तभी से होलिका दहन की परंपरा चली आ रही है .

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By PANKAJ KUMAR SINGH

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