मानसिक प्रताड़ना और झूठे आरोपों से टूट रहा परिवार, न्याय की गुहार

मानसिक प्रताड़ना और झूठे आरोपों से टूट रहा परिवार, न्याय की गुहार

-कर्मचारियों के हित में आवाज उठाने की मिल रही सजा : डीसी रजक जमुई बिहार राज्य अराजपत्रित कर्मचारी महासंघ गोपगुट के जिलाध्यक्ष डीसी रजक ने गंभीर आरोप लगाते हुए कहा है कि कर्मचारियों एवं शिक्षकों के हित में लगातार आवाज उठाने के कारण उन्हें योजनाबद्ध तरीके से मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जा रहा है. उन्होंने कहा कि विभागीय दबाव, लगातार अपमान और झूठे आरोपों के कारण वे अत्यधिक मानसिक तनाव से गुजर रहे हैं. डीसी रजक ने कहा कि महासंघ हमेशा शिक्षा विभाग में कार्यरत शिक्षकों एवं कर्मचारियों की समस्याओं व अधिकारों को लेकर संघर्ष करता रहा है. इसी वजह से कुछ विभागीय पदाधिकारी एवं तथाकथित कुछ बिचौलिया उन्हें मानसिक रूप से तोड़ने की कोशिश कर रहे हैं. उन्होंने आरोप लगाया कि न्यायालय में मामला विचाराधीन रहने के बावजूद शिक्षा विभाग द्वारा नियमों की अनदेखी करते हुए लगातार दो बार स्पष्टीकरण की मांग की गई. उन्होंने बताया कि ई-शिक्षा कोष पोर्टल से 12 माह की उपस्थिति रिपोर्ट निकालकर अनावश्यक एवं मनगढ़ंत आधार पर स्पष्टीकरण मांगा गया. वहीं 39 वर्षों की निष्कलंक सेवा के बावजूद मेरे उपर जाली प्रमाण पत्र रखने जैसे गंभीर और निराधार आरोप लगाए गए. साथ ही सशरीर उपस्थित होकर जवाब देने का दबाव भी बनाया गया. डीसी रजक ने आरोप लगाया कि उच्च माध्यमिक विद्यालय चोफला की प्रधानाध्यापिका रजनी कुमारी के माध्यम से साजिशन शिकायत पत्र तैयार कराया गया, जिसमें महिला का कपड़ा फाड़ने एवं धमकी देने जैसे आरोप लगाकर मेरी सामाजिक छवि धूमिल करने की कोशिश की गई. उन्होंने कहा कि यह सब कर्मचारियों एवं शिक्षकों के पक्ष में आवाज उठाने वालों का मनोबल तोड़ने की साजिश है. लाखों रुपये की ठगी से जुड़े झूठे एवं आधारहीन आरोप लगाकर खबरें प्रकाशित करवाई गईं, ताकि मेरी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाया जा सके. लगातार विभागीय नोटिस, मानसिक दबाव के कारण मेरा पूरा परिवार तनाव और भय के माहौल में जीने को मजबूर है. डीसी रजक ने कहा कि न्याय की मांग को लेकर मैंने आयुक्त मुंगेर प्रमंडल, आरक्षी अधीक्षक जमुई, अपर मुख्य सचिव बिहार सरकार पटना, अनुसूचित जाति एवं जनजाति आयोग पटना तथा राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग नई दिल्ली को आवेदन भेजकर मामले की निष्पक्ष जांच की मांग की है. यदि न्याय नहीं मिला तो न्यायालय की शरण लेने को बाध्य होंगे.

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