जिले में तीन से चार करोड़ का होता है कारोबार
जमुई : मकर संक्रांति के अवसर पर तिलकुट के इस्तेमाल का अपना एक विशेष महत्व है और इसी वजह से मकर संक्रांति को तिलासंक्रांति के नाम से भी जाना जाता है. तिलकुट विक्रेताओं के अनुसार लोग दूसरे प्रदेश में रहने वाले अपने सगे संबंधियों के लिए जिले में बनने वाले अलग अलग किस्म के तिलकुट को संदेश के रूप में ले जाते हैं. विद्वानों की मानें तो मकर संक्रांति के मौके पर तिल या तिल से बनी सामग्रियों के इस्तेमाल के पीछे कई प्रकार की किवदतियां प्रचलित है. लेकिन मूल रूप से वैज्ञानिक कारण यह है कि तिल, गुड़ और चीनी का तासीर गर्म होती है. इसलिए इसके मिश्रण से बनने वाली तिलकुट या अन्य सामग्री शरद ऋतु में स्वास्थ्य के लिए लाभदायी होता है. जानकारों की मानें तो विगत 30 से 35 वर्ष पूर्व से ही लोगों के द्वारा मकर संक्रांति के अवसर पर तिलकुट का इस्तेमाल किया जा रहा है.
तिलकुट एक, वेरायटी अनेक: मकर संक्रांति को लेकर पूरा बाजार तिलकुट से पट चुका है. बाजार में बनी स्थायी और अस्थायी दुकानों में कई किस्म के तिलकुट उपलब्ध हैं. इसमें प्लेन गुड़, प्लेन चीनी, गजक, केशर पापड़ी, खोवा पापड़ी, मेवा पराठा, अखरोट पिस्ता, काजू खास्ता समेत कई वेरायटी के तिलकुट 120 से ले 600 रुपये तक में बिक्री के लिए उपलब्ध है.
खोवा तिलकुट की मांग सबसे ज्यादा: तिलकुट कारोबारियों की माने तो लगभग डेढ़ माह पूर्व से ही हमलोग स्थानीय तथा बाहरी कारीगरों की मदद से तिलकुट बनाने के काम में लग जाते हैं.पूर्व में जहां लोग प्लेन गुड़ व प्लेन चीनी का तिलकुट खरीदते थे. वहीं अब खोवा वाले तिलकुट की मांग बढ़ गयी है.
महंगाई ने घटायी बिक्री: मकर संक्रांति के अवसर पर तिलकुट बेचने वाले सुनील कुमार, शंकर गुप्ता, राम कुमार, विनोद गुप्ता, संजय कुमार आदि ने बताया कि हमलोग पिछले पांच छह वर्ष से इस कारोबार से जुड़े हुए हैं. महंगाई के कारण बिक्री पर 25 से 30 प्रतिशत तक असर पड़ा है.
