वैशाली: दहेज हत्या मामले में पति को उम्रकैद, सास-ससुर को संदेह का लाभ देकर किया गया बरी

हाजीपुर की एक अदालत ने दहेज हत्या के मामले में अहम फैसला सुनाया है. मृतका के पति रोहित कुमार को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई है, वहीं सास और ससुर को बरी कर दिया गया है. यह फैसला न्यायिक प्रक्रिया में एक वर्ष के भीतर मामले के निष्पादन की मिसाल है.

Hajipur News: दहेज हत्या के एक मामले में जिला अपर सत्र न्यायाधीश-12 सत्यनारायण लाल सहानजी की अदालत ने मृतका के पति रोहित कुमार को आजीवन कारावास की सजा सुनाई है. वहीं सास और ससुर को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया गया.

शादी के बाद शुरू हुई दहेज की मांग

लोक अभियोजक श्याम बाबू राय ने बताया कि मुजफ्फरपुर जिले के सकरा थाना क्षेत्र स्थित इसरा गांव निवासी आकांक्षा कुमारी की शादी 16 जून 2023 को कटहारा थाना क्षेत्र के सेहान गांव निवासी रोहित कुमार के साथ हुई थी.

आरोप के अनुसार शादी के बाद से ही पति, सास और ससुर द्वारा दहेज में चार पहिया वाहन की मांग की जाने लगी. मांग पूरी नहीं होने पर आकांक्षा को मानसिक और शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया जाता था.

शादी के छह माह बाद हुई थी हत्या

अभियोजन के अनुसार 29 दिसंबर 2023 को दहेज की मांग पूरी नहीं होने पर आकांक्षा कुमारी की गला दबाकर हत्या कर दी गई. घटना की सूचना मृतका के ममेरे भाई अमरजीत कुमार को ससुराल पक्ष के ही एक व्यक्ति ने दी थी.

सूचना मिलने पर कटहारा थाना पुलिस मौके पर पहुंची और शव को पोस्टमार्टम के लिए भेजा. इसके बाद अमरजीत कुमार के आवेदन पर थाना में प्राथमिकी दर्ज की गई.

पुलिस ने तीन लोगों के खिलाफ दाखिल किया था आरोप पत्र

पुलिस जांच में दहेज हत्या की पुष्टि होने के बाद 10 मई 2024 को पति रोहित कुमार, ससुर कुमोद ठाकुर और सास मंजू देवी के खिलाफ आरोप पत्र दाखिल किया गया.

21 जनवरी 2025 को मामला सत्र न्यायालय में पहुंचा और तीनों आरोपियों के विरुद्ध आरोप गठन किया गया.

पति दोषी करार, सास-ससुर बरी

दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अदालत ने 16 जुलाई 2026 को रोहित कुमार को दहेज हत्या का दोषी करार दिया था. वहीं सास मंजू देवी और ससुर कुमोद ठाकुर को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया गया.

आजीवन कारावास और जुर्माने की सजा

सजा के बिंदु पर सुनवाई के बाद अदालत ने बुधवार को रोहित कुमार को दहेज हत्या के अपराध में आजीवन कारावास की सजा सुनाई. इसके साथ ही सात वर्ष के सश्रम कारावास और पांच हजार रुपये के आर्थिक दंड का भी आदेश दिया गया.

एक वर्ष के भीतर हुआ मुकदमे का निष्पादन

लोक अभियोजक ने बताया कि आरोप गठन के बाद बिना स्पीडी ट्रायल के ही लगभग एक वर्ष के भीतर मामले का निष्पादन कर अभियुक्त को सजा दिलाई गई, जो न्यायिक प्रक्रिया की दृष्टि से महत्वपूर्ण उपलब्धि मानी जा रही है.


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Author: Abhishek shaswat

Published by: Nikhil Anurag

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