उचकागांव.
वह खौफनाक मंजर आज भी आंखों के सामने घूमता है कि कैसे डकैतों ने बंधक बनाकर कांड को अंजाम दिया. आंखों के सामने पिता जी को भाला व गोली मारी गयी. उनका तड़पता हुआ शब्द रात में सोने नहीं देता. कानून में छेद का लाभ अभियुक्तों ने बारीकी से उठाया. यह कहना है उचकागांव थाने के लखना खास गांव में जय राम सिंह के 70 वर्षीय पुत्र जलेश्वर प्रसाद का. उन्होंने बताया कि 2-3 दिसंबर 1983 की आधी रात में हथियारों से लैस डकैतों ने जो कोहराम मचाया, उससे पूरा इलाका थर्रा उठा था. भाई के बयान पर केस हुआ. केस को पूरी मुस्तैदी से कोर्ट में लड़ते रहे. हर तारीख पर जाकर गवाहों का साक्ष्य कराया. हाकिम के बदलते ही फाइल से पोस्टमार्टम रिपोर्ट को दो बार गायब कर दिया गया, जिससे केस की सुनवाई पेंडिंग होती रही. अभियुक्तों के प्रभाव के कारण चाहकर भी कुछ नहीं कर पा रहे थे. पूरी जवानी केस लड़ने में गुजार दी. कोर्ट का चक्कर काटते-काटते पारसनाथ सिंह की मौत भी वर्ष 2023 में हो गयी. उधर पांच अभियुक्तों की मौत के बाद इंसाफ की उम्मीद भी छोड़ चुके थे. अब कोर्ट से दोबारा गवाही का समन मिला, तो अब फिर से एक-एक गवाह के पास जाकर आग्रह करेंगे. अब गवाह कितना कोर्ट जा पायेंगे. एक की मौत हो गयी है तो बाकी लोग भी बुजुर्ग हो चुके हैं. 42 वर्ष बाद कांड के आइओ भी जीवित होंगे, यह कहना मुश्किल है. कानूनविद ने कहा, विलंब से मिलने वाला इंसाफ नहीं होताविलंब से मिलने वाला इंसाफ इंसाफ नहीं रह जाता. यह पूरा मामला बहुत ही गंभीर है. कोर्ट को ऐसे मामलों को ढूंढ़कर उसका स्पीडी ट्रायल चलाकर फैसला देना चाहिए.
मनीष मिश्र, अधिवक्ता, गोपालगंजपुराने मामलों में तेजी से हो निबटारा: विधिज्ञ संघउचकागांव की डकैती के दौरान हत्या का यह कांड पूरे सिस्टम पर गंभीर सवाल है. अभियोजन की विफलता है. मैं कोर्ट से अपील करता हूं कि 10 साल से पुराने मामलों को स्पीडी ट्रायल की तरह सुनवाई कर फैसला दिया जाये, ताकि पीड़ितों को धीरेंद्र कुमार मिश्र उर्फ मुन्ना मिश्र, अध्यक्ष विधिज्ञ संघ गोपालगंज
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