hathua assembly : कभी मिनी सचिवालय के नाम से मशहूर राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में रहा फुलवरिया गांव आज बदहाली की मार झेल रहा है.
गोपालगंज जिले का यह गांव, जो एक दौर में राजनीतिक रुतबे और सरकारी सुविधाओं का पर्याय माना जाता था, अब उपेक्षा की गहराइयों में डूबा हुआ है. जब लालू प्रसाद यादव सत्ता के शिखर पर थे, तब यह गांव विकास का प्रतीक बन गया था. प्रखंड मुख्यालय, अंचल कार्यालय, कृषि भवन, निबंधन कार्यालय, रेफरल अस्पताल, पावर सबस्टेशन, रेलवे स्टेशन और पुलिस थाने की मौजूदगी ने फुलवरिया को एक अलग पहचान दी थी. उस समय यहां बना हेलीपैड पूरे क्षेत्र की शान था, जहां वीवीआइपी नेताओं, मंत्रियों और अधिकारियों के हेलीकॉप्टर उतरते थे.न तो सड़कें पहले जैसी और न ही स्वास्थ्य केंद्र
ग्रामीण बताते हैं कि सुरक्षा व्यवस्था, प्रशासनिक गतिविधियों और चहल-पहल के कारण फुलवरिया का यह हेलीपैड पटना के वीआइपी हेलीपैड को भी टक्कर देता था. लेकिन, सत्ता परिवर्तन और समय की करवट के साथ परिस्थितियां बदल गयीं. आज वही हेलीपैड वीरान पड़ा है. चारों ओर झाड़ियां और बबूल के पेड़ उग आये हैं. जर्जर बाउंड्री और टूटे सूचना पट्ट उपेक्षा की कहानी खुद बयां कर रहे हैं. सरकारी दफ्तर आज भी मौजूद हैं, लेकिन गतिविधियां नाम मात्र तक सीमित रह गयी हैं. न तो सड़कें पहले जैसी हैं और न ही स्वास्थ्य केंद्रों में वह सुविधा बची है, जिस पर गांव को कभी गर्व था.फुलवरिया की बदहाली बनती दिख रही चुनावी मुद्दा
ग्रामीणों का कहना है कि लालू परिवार के सत्ता से बाहर होने के बाद इस क्षेत्र पर प्रशासनिक ध्यान कम हो गया. विकास की रफ्तार थम गयी और युवाओं को रोजगार की तलाश में बाहर जाना पड़ रहा है. अब विधानसभा चुनाव में फुलवरिया की बदहाल तस्वीर चुनावी मुद्दा बनती दिख रही है. ग्रामीणों की साफ राय है कि जिस दौर में यह गांव चमक रहा था, वह सत्ता परिवर्तन के बाद अंधेरे में बदल गया. लोगों को उम्मीद है कि जो भी सत्ता में आयेगा वह इस गांव की खोई हुई पहचान को फिर से लौटाने की दिशा में ठोस कदम उठायेगा.डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है
