Hathua-Bhatni Rail Line: हथुआ-भटनी रेल लाइन परियोजना से गोपालगंज और सीमावर्ती राज्य यूपी के पिछड़े इलाकों को रेल नेटवर्क से जोड़ने और आवागमन की बड़ी समस्या दूर होने की उम्मीद जगी थी. लेकिन, दो दशक बाद भी यह परियोजना अधूरी पड़ी है. इस परियोजना में अब तक करीब 277.13 करोड़ रुपये खर्च किये जा चुके हैं. गोपालगंज के सांसद डॉ. आलोक कुमार सुमन ने अधूरे कार्य को पूरा कराने के लिए प्रशासनिक स्वीकृति और आवश्यक धनराशि उपलब्ध कराने की मांग रेल मंत्री से की थी. इसके लिए सांसद द्वारा संसद में भी आवाज उठायी गयी थी तथा क्षेत्र के लोगों की मांग को सरकार तक पहुंचाया गया था. इसके बावजूद इस प्रोजेक्ट को लेकर अब तक कोई अग्रेतर कार्यवाही नहीं हुई है.
इधर, हाल ही में आरटीआई के माध्यम से भी इस प्रोजेक्ट को लेकर कई महत्वपूर्ण जानकारियां सामने आयी हैं. मिली जानकारी के अनुसार, रेलवे ने भूमि अधिग्रहण में देरी और कार्य प्रगति धीमी होने के कारण वर्ष 2020 में इस प्रोजेक्ट को ड्रॉप करने की स्वीकृति दे दी थी. इसके बाद प्रोजेक्ट से संबंधित सारी गतिविधियां बंद कर दी गयीं.
2005-06 में इस परियोजना को मिली थी स्वीकृति
हथुआ से यूपी के भटनी तक नयी रेल लाइन बिछाने की परियोजना को वर्ष 2005-06 में मंजूरी मिली थी. सूबे के पूर्व मुख्यमंत्री और राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव ने अपने रेल मंत्रित्वकाल में इसका शुभारंभ किया था. इसका उद्देश्य गोपालगंज जिले के हथुआ, भोरे, विजयीपुर, पंचदेवरी सहित आसपास के इलाकों को सीधे रेल नेटवर्क से जोड़ना था.
परियोजना के तहत बिहार में करीब 67 किलोमीटर तथा यूपी में 12.45 किलोमीटर रेल लाइन प्रस्तावित थी. शुरुआती दौर में काम भी तेजी से आगे बढ़ा और कई स्थानों पर पुल समेत रेललाइन से जुड़े कार्य कराये गये.
पंचदेवरी के बाद आगे नहीं बढ़ सकी हथुआ-भटनी रेल परियोजना
परियोजना का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा पंचदेवरी क्षेत्र से जुड़ा है. हथुआ से पंचदेवरी तक करीब 31 किलोमीटर हिस्से में रेल परियोजना के अधिकांश कार्य लगभग पूरे हो गये हैं. पंचदेवरी से सोनपुर तक पैसेंजर ट्रेन का परिचालन भी होता है. लेकिन, पंचदेवरी से भटनी तक करीब 48 किलोमीटर का हिस्सा अब भी अधूरा है.
इसी अधूरे हिस्से के कारण क्षेत्र के लोगों का वर्षों पुराना रेल का सपना पूरा नहीं हो पा रहा है. रेल लाइन बनने से पंचदेवरी, भोरे, विजयीपुर और कटेया क्षेत्र के लोगों को यूपी के देवरिया, भटनी और आगे गोरखपुर सहित दूसरे शहरों तक आवागमन की बेहतर सुविधा मिलने की उम्मीद थी.
व्यवसाय, स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र में भी यह परियोजना क्षेत्र के लिए संजीवनी साबित हो सकती थी. लेकिन, दो दशक बाद भी परियोजना के अधर में लटके रहने से क्षेत्रवासियों में निराशा है.
