जेल में रह कर भी बरकरार है शहाबुद्दीन की राजनीतिक धमक

जेल में रह कर भी बरकरार है शहाबुद्दीन की राजनीतिक धमक सीवान. सीवान में साहेब के नाम से मशहूर राजद नेता व पूर्व सांसद मो. शहाबुद्दीन का लंबे समय तक जिले की राजनीति में धमक रही है. साथ ही राज्य की राजनीति में भी उनकी पहचान रही है. किसी के सामने नहीं झूकने के लिए […]

जेल में रह कर भी बरकरार है शहाबुद्दीन की राजनीतिक धमक सीवान. सीवान में साहेब के नाम से मशहूर राजद नेता व पूर्व सांसद मो. शहाबुद्दीन का लंबे समय तक जिले की राजनीति में धमक रही है. साथ ही राज्य की राजनीति में भी उनकी पहचान रही है. किसी के सामने नहीं झूकने के लिए भी शहाबुद्दीन जाने जाते हैं. एक समय ऐसा भी रहा जब शहाबुद्दीन के राजद सुप्रिमो लालू प्रसाद से भी तल्ख रिश्ते हो गये थे. और यहां तक की प्रतापपुर में हुए तत्कालीन एसपी बच्चु सिंह मीणा के शहाबुद्दीन विरोधी ऑपरेशन को लालू के सह पर किये जाने की भी चर्चा रही. कहा जाता है कि अगर शहाबुद्दीन वहां से नहीं भागते, तो उन्हें मारने का प्लान था. इसके बाद शहाबुद्दीन जेल में बंद रहे. फिर लालू प्रसाद खुद उनसे आ कर मिले तो रिश्तों की तल्खी कम हुई. जहां तक शहाबुद्दीन के राजनीतिक कैरियर की बात है, तो 1990 में वे जीरादेई विधानसभा क्षेत्र से विधायक चुने गये. इसके बाद तो शहाबुद्दीन की राजनीति लगातार आगे बढ़ती गयी और उन्होंने पीछे मुड़ कर नहीं देखा. 1995 में लगातार दूसरी बार जीरादेई से विधायक बने. फिर 1996 के लोकसभा चुनाव में जनता दल की टिकट पर खड़े हुए. और विजयी रहे. इसके बाद तो शहाबुद्दीन का राजनीतिक कद लगातार बढ़ता गया. 1998, 1999, 2004 तक लगातार चार बार सीवान लोकसभा क्षेत्र का उन्होंने प्रतिनिधित्व किया. दो दशक तक शहाबुद्दीन की धाक रही . जिले में राजद का मतलब शहाबुद्दीन से था. जिला परिषद से लेकर नगर परिषद व विधान परिषद एवं विधानसभा तक की राजनीति जिले में उन्हीं के इशारे पर होती रही. राजनीति के साथ ही अपराध की दुनिया में भी उनकी धाक बतायी जाती है. वर्ष 2000 में अल्पमत की सरकार को बहुमत में बदलने में शहाबुद्दीन का बड़ा योगदान रहा था. इधर दो चुनाव में उनकी पत्नी के चुनाव हारने और लगातार करीब 12 वर्ष से जेल में बंद होने के कारण उनका राजनीतिक कद कुछ कम होता माना गया. लेकिन, शहाबुद्दीन की बादशाहत बरकरार रही. 2015 में राजद और जदयू के गठबंधन से मो. शहाबुद्दीन जिले की राजनीति में केंद्र में आ गये और इस वर्ष हुए विधानसभा चुनाव में जिले में महागंठबंधन की सीटों का फैसला उनके द्वारा हीं किये जाने की बात सामने आयी.

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