Gaya Poetry Event : गया जी जिला हिन्दी साहित्य सम्मेलन भवन में काव्य संध्या 624 का आयोजन किया गया, जिसकी अध्यक्षता सुरेन्द्र सिंह सुरेंद्र व संचालन सहज कुमार ने किया. सुरेंद्र पांडेय सौरभ ने मगही गजल पढ़ी.
कहा- दर्द जियरा से उठल तो गजल हो गइल, लोर अंखिया से छूटल तो गजल हो गइल. शैलेश कुमार ज्ञानी ने कजरी में गाया- लगल हे धान के रोपनिया, पड़ेला झिर झिर बुनिया. डॉ. राम परिखा सिंह ने कहा- बिहार के किसनमा हथीन परेशान, पनिया न बरसे से. डॉ. निरंजन श्रीवास्तव ने सावन पर कविता पढ़ी. कहा- सावन में वसुंधरा बनी रानी, झूम झूम कर बरसा पानी.
कवियों द्वारा प्रस्तुत गीत और गजलें
नरेन्द्र सिंह ने गीत में गाया- हे भोलेदानी सब जानत बानी, हमरो करी उठान बाबा. विपिन बिहारी ने गजल में गाया- दूर से उनका चेहरा नजर आता है, निकट से जख्म गहरा नजर आता है. नौशाद नादां ने कहा- गुजरे पलों को लौट के फिर आना चाहिए. डॉ. राकेश कुमार सिन्हा 'रवि' ने कहा- सात पहाड़ियों के बीच हंसता हुआ सावन, खुश गवार लगे शहर का हर घर-आंगन.
हास्य और अन्य प्रस्तुतियां
शंकर प्रसाद ने अपनी हास्य कविता पढ़ी. कहा- बरसात में थैले में रख छाता, पूरा बाजार घूम आता हूं, खुद को पानी में भींगकर, खुद को असहज पाता हूं. युवा कवि जय प्रकाश सिंह ने एक सवाल कविता पढ़ी. कहा- सड़क पूछता एक सवाल, क्यों है मेरा खास्ता हाल. घनश्याम कुमार अवस्थी ने कहा- बरसा बरसी मन हरस गये, नूतन किसलय मन तरस गये.
समापन और धन्यवाद ज्ञापन
बिनोद बरबिगहिया ने कहा- एक प्रणाम लेती एक, देती अनेक. सहज कुमार ने कहा- वर्षा आये तो आये, मुझे नहीं रुकना. बैजू सिंह ने कहा- सांप छोड़ले, सांप केंचुल गंगा मइया छोड़ले अनार. महामंत्री सुमंत ने कहा- अभी रोपल न पूरा होएल धान, से बाबा कइसे अइयो बाबाधाम. अंत में सभापति ने धन्यवाद ज्ञापित किया.
