Manda Hill Gaya Ji : गया जी जिले की पहाड़ियों में गुरुआ की मंडा पहाड़ी का विशेष महत्व है. इसे मंडिका गिरि के नाम से भी जाना जाता है. अति प्राचीन काल में इस पहाड़ी पर दुर्वासा ऋषि ने अपना डेरा जमाया था, इसी कारण कहीं-कहीं इसे दुर्वासा पहाड़ी भी कहा जाता है.
मंडा पहाड़ी का संबंध मंडन मिश्र से भी जोड़ा जाता है, और मान्यता है कि यहां पहाड़ी तक आदि शंकराचार्य को विदा करने लोग पहुंचे थे. पहाड़ी की चोटी पर स्थित भद्रा देवी का भव्य मंदिर इसे धार्मिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण बनाता है.
भौगोलिक स्थिति और प्राचीन गुफाओं का उल्लेख
गुरुआ प्रखंड मुख्यालय से करीब छह किलोमीटर पश्चिम गुरुआ-भरौंधा-महापुर मार्ग पर और राष्ट्रीय राजमार्ग से करीब दो से सात किलोमीटर उत्तर गुरुआ के ऐतिहासिक पर्वत में सात छोटी-बड़ी गुफाओं का उल्लेख मिलता है.
आधुनिक काल में मेजर किट्टो ने यहां का सर्वेक्षण कर विस्तृत विवरण प्रस्तुत किया था. मंडा पहाड़ी के पूर्व से उत्तर तक करीब 50 एकड़ से अधिक भू-भाग में गढ़ के अवशेष फैले हुए हैं, जिनमें विभिन्न कालखंडों के अलावा ईंट और विग्रह के अवशेष भी मौजूद हैं.
हिंदू और बौद्ध धर्म से जुड़ी मूर्तियों के अवशेष
पूरी मंडा पहाड़ी पर एक से बढ़कर एक प्रतिमा तथा उनके खंडित अंश मिलना इस बात का प्रमाण है कि यह स्थल प्राचीन काल से ही महत्वपूर्ण रहा होगा.
यहां हिंदू और बौद्ध धर्म से जुड़ी मूर्तियों के खंडित अवशेष भी मिलते हैं, जो क्षेत्र के ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व को दर्शाते हैं. वर्तमान समय में भी इस क्षेत्र से प्रतिमाओं के अवशेष मिलने की बात सामने आती रहती है.
पर्यटन और ऐतिहासिक अध्ययन का केंद्र बनने की संभावना
मंडा, दुब्बा और भूरहा से अधिक दूरी नहीं होने के कारण यह क्षेत्र प्राचीन काल से ही बौद्ध साधकों और संन्यासियों के आवागमन का केंद्र रहा है. स्थानीय लोगों का कहना है कि लगभग ढाई सौ वर्ष पुराना इसका इतिहास है.
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मंडा पहाड़ी को पहाड़ियों का केंद्र बनाकर इसके संरक्षण और विकास के लिए व्यापक एवं ठोस पहल की जरूरत है. यह क्षेत्र पिकनिक स्पॉट के रूप में भी चर्चित है और यदि इसका समुचित विकास किया जाए तो यह ऐतिहासिक अध्ययन का महत्वपूर्ण केंद्र बन सकती है.
मंडा देवी मंदिर प्रांगण में सुरक्षित पुरातात्विक धरोहरें
मंडा मिडिल स्कूल के समीप स्थित देवी मंदिर के प्रांगण में बौद्ध एवं सनातन धर्म से संबंधित अवशेष सुरक्षित हैं. इन मूर्तियों में भगवान बुद्ध की भूमि-स्पर्श मुद्रा, अभय मुद्रा एवं उनके जीवन की महत्वपूर्ण घटनाओं का चित्रण है.
इसके अतिरिक्त, वेदिका स्तूप के अवशेष भी यहां पाए जाते हैं और शैव परंपरा से संबंधित उमा-महेश्वर की प्रतिमा भी यहां स्थित है. ग्रामीणों द्वारा इन सभी पुरातात्विक धरोहरों का संरक्षण किया गया है, जो अतीत की गाथा सुनाती हैं.बल्कि इसे संरक्षित कर आगे की पीढ़ियों के लिए सहेजना भी आवश्यक है.
