दरभंगा: जिसने अपना घर-परिवार छोड़कर भगवती अहल्या को ही अपना सब कुछ मान लिया था, वह सिया सहचरी शुक्रवार को 102 वर्ष की उम्र में इस लोक को छोड़ गोलोकवासी हो गयीं. उन्होंने अपनी छोटी बेटी जानकी के ब्रह्मपुर स्थित घर में अंतिम सांस ली. उनके निधन की खबर मिलते ही अहियारी गांव और अहल्यास्थान में शोक की लहर दौड़ गयी.
सिया सहचरी कौन थीं और कहां से आयी थीं, इसके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं. अहियारी के ग्रामीणों के अनुसार, वर्ष 1980 के दशक में वह एक भटकी हुई महिला की तरह गांव पहुंची थीं. करीब दस दिनों तक गांव की गलियों में भटकने के बाद ग्रामीणों ने उन्हें अहल्या गह्वर में जाने की सलाह दी. इसके बाद वह अहल्या की शरण में गयीं और फिर उनका जीवन भगवती की सेवा में ही समर्पित हो गया.
कमला सहचरी ने सिखायी पूजा की विधि
अहल्या गह्वर की तत्कालीन पुजारिन कमला सहचरी ने सिया सहचरी को अपना लिया. उन्होंने उन्हें पूजा की विधि सिखायी. इसके बाद सिया सहचरी ने भगवती अहल्या को ही अपनी मां मान लिया.
करीब 40 वर्षों तक उन्होंने बिना एक दिन नागा किये भगवती की सेवा की. सर्दी हो, गर्मी हो या बारिश, वह सुबह उठकर भगवती का श्रृंगार करतीं, भोग लगातीं और आरती करतीं.
ग्रामीणों के अनुसार, भगवती के प्रति सिया सहचरी की श्रद्धा और ममता देखते ही बनती थी. उनकी आंखों में अहल्या के लिए ऐसी ममता दिखती थी, जैसे कोई मां अपनी बेटी को निहार रही हो.
अंतिम समय तक जुड़ा रहा अहल्या का नाम
पिछले करीब एक वर्ष से उनका शरीर साथ नहीं दे रहा था. इसके बाद उनकी छोटी बेटी जानकी उन्हें अपने साथ ब्रह्मपुर ले गयी थीं. हालांकि, परिजनों और ग्रामीणों के अनुसार, अंतिम समय तक उनके होंठों पर भगवती अहल्या का ही नाम रहा. बताया जाता है कि वह आखिरी समय तक “अहल्या, मेरी अहल्या” कहती रहीं.
निधन की खबर सुन दौड़े श्रद्धालु
शुक्रवार को सिया सहचरी के निधन की खबर अहियारी पहुंची, तो पूरा अहल्यास्थान शोक में डूब गया. दर्जनों श्रद्धालु ब्रह्मपुर पहुंचे. किसी की आंखों में आंसू थे, तो किसी के हाथों में फूल. श्रद्धालुओं ने उन्हें अपनी मां के समान मानकर अंतिम प्रणाम किया.
अंतिम संस्कार के दौरान जब उनके नाती ने मुखाग्नि दी, तो वहां मौजूद लोगों की आंखें नम हो गयीं. करीब चार दशक तक अहल्या गह्वर में भगवती की सेवा करने वाली सिया सहचरी की विदाई को श्रद्धालुओं ने एक युग के अंत के रूप में महसूस किया.
अहल्यास्थान की सीढ़ियां अब उस साधिका के कदमों को तलाश रही हैं, जो चार दशक तक वहां नियमित रूप से पहुंचती रही. मंदिर की घंटियां जैसे उनकी आरती का इंतजार कर रही हैं.
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