सिर्फ कर्बला नहीं, कई ऐतिहासिक और धार्मिक घटनाओं से जुड़ा है मुहर्रम, जानिए आशूरा का इतिहास

मुहर्रम को केवल कर्बला की शहादत तक सीमित नहीं माना जाता. इस्लामी परंपराओं में आशूरा को कई नबियों से जुड़ी महत्वपूर्ण घटनाओं का दिन माना गया है. अलीनगर में ताजियादारी की करीब ढाई सौ वर्ष पुरानी परंपरा भी आज चर्चा का विषय है.

दरभंगा के अलीनगर से एम.ए. सारिम की रिपोर्ट

Muharram History: मुहर्रम का महीना आम तौर पर हजरत इमाम हुसैन और कर्बला की शहादत की याद में मनाया जाता है. हालांकि इस्लामी परंपराओं में आशूरा (10 मुहर्रम) को कई अन्य महत्वपूर्ण धार्मिक घटनाओं से भी जोड़ा जाता है. स्थानीय उलेमा और इस्लामी इतिहास के जानकारों का कहना है कि मुहर्रम की धार्मिक अहमियत केवल कर्बला तक सीमित नहीं है.

आशूरा से जुड़ी कई धार्मिक मान्यताएं

इस्लामी मान्यताओं के अनुसार आशूरा के दिन कई महत्वपूर्ण घटनाएं हुईं. इनमें हजरत आदम की तौबा कबूल होना, हजरत नूह की कश्ती का किनारे लगना, हजरत इब्राहीम का आग से सुरक्षित निकलना, हजरत मूसा और बनी इसराइल को फिरऔन से मुक्ति मिलना, हजरत यूनुस का मछली के पेट से बाहर आना तथा अन्य कई घटनाओं का उल्लेख मिलता है.

इसी दिन कर्बला के मैदान में हजरत इमाम हुसैन और उनके साथियों की शहादत भी हुई, जिसे इस्लामी इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं में गिना जाता है.

ताजियादारी की परंपरा पर अलग-अलग मत

रिपोर्ट के अनुसार भारत में ताजियादारी की शुरुआत को लेकर अलग-अलग ऐतिहासिक मत हैं. कई इतिहासकार इसे तैमूरलंग के काल से जोड़ते हैं, हालांकि इस विषय पर एकमत राय नहीं है.

धार्मिक जानकारों का कहना है कि समय के साथ ताजियादारी के स्वरूप में काफी बदलाव आया है. कई स्थानों पर आज भी मजलिस, फातिहा और कुरआनख्वानी जैसी धार्मिक परंपराएं निभाई जाती हैं, जबकि कुछ जगहों पर इसके स्वरूप को लेकर मतभेद भी देखने को मिलते हैं.

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आशूरा कब है, क्यों मनाया जाता है और इसका क्या महत्व है?

इस वर्ष मुहर्रम का दसवां दिन (यौमे आशूरा) गुरुवार 26 जून को मनाया जाएगा. इस्लामी परंपरा में आशूरा को अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है. यही वह दिन है, जिसे कर्बला की घटना और हजरत इमाम हुसैन की शहादत की याद में मनाया जाता है.

साथ ही इस्लामी मान्यताओं के अनुसार इस दिन कई नबियों के जीवन से जुड़ी महत्वपूर्ण घटनाओं का भी उल्लेख मिलता है. इसी कारण मुहर्रम केवल शोक और स्मरण का अवसर ही नहीं, बल्कि सब्र, कुर्बानी, इंसाफ और सच्चाई के संदेश को याद करने का भी पर्व माना जाता है.

देशभर में इस अवसर पर मजलिस, ताजियादारी, मातमी जुलूस और दुआओं का आयोजन किया जाता है, जबकि विभिन्न क्षेत्रों में स्थानीय परंपराओं के अनुसार भी कार्यक्रम आयोजित होते हैं.

अलीनगर में ढाई सौ वर्ष पुरानी है परंपरा

स्थानीय लोगों के अनुसार दरभंगा के अलीनगर में करीब ढाई सौ वर्ष पहले ताजियादारी की परंपरा शुरू हुई थी. बाद में जमींदार परिवार की हसीनतुन निशां ने इमामबाड़ा और मजलिसखाना का निर्माण कराया तथा इसके लिए जमीन भी दान की.

इसके बाद क्षेत्र के कई गांवों में ताजिया बनने लगे. श्यामपुर का ताजिया अपनी कलात्मक बनावट और नक्काशी के लिए दूर-दूर तक प्रसिद्ध हुआ. हालांकि हाल के वर्षों में कई गांवों में यह परंपरा धीरे-धीरे समाप्त भी हुई है.

इस बार नहीं लगेगा मुहर्रम मेला

अलीनगर हाट मैदान में हर वर्ष कई ताजियों का मिलान होता है, जहां बड़ी संख्या में लोग जुटते हैं. इस अवसर पर मेला भी लगता रहा है.

लेकिन इस बार प्रशासन ने विधि-व्यवस्था को देखते हुए मीना बाजार, झूला और अस्थायी दुकानों की अनुमति नहीं दी है. ऐसे में इस बार मुहर्रम के दौरान पूर्व की तरह मेले का आयोजन नहीं होगा.

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लेखक के बारे में

Published by: Sarfaraz Ahmad

सरफराज अहमद IIMC से प्रशिक्षित पत्रकार हैं. राजनीति, समाज और हाइपरलोकल मुद्दों पर लिखते हैं. क्रिकेट और सिनेमा में गहरी रुचि रखते हैं. बीते तीन वर्षों से मीडिया क्षेत्र में सक्रिय हैं और वर्तमान में प्रभात खबर की डिजिटल टीम के साथ कार्यरत हैं।

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