दरभंगा के कुशेश्वरस्थान पूर्वी से संतोष पोद्दार की रिपोर्ट
Darbhanga Flood News: कमला बलान नदी का जलस्तर बढ़ने के साथ ही कुशेश्वरस्थान पूर्वी प्रखंड के कई गांवों में बाढ़ का खतरा गहरा गया है. हर साल की तरह इस बार भी हजारों लोगों के सामने घर छोड़कर तटबंध पर शरण लेने की नौबत आ गई है. गांवों का संपर्क टूटने लगा है और नाव ही लोगों की जिंदगी का सहारा बनती जा रही है.
चार पंचायतों पर सबसे ज्यादा बाढ़ का खतरा
कुशेश्वरस्थान पूर्वी प्रखंड की नौ पंचायतों में से इटहर, चौकिया, लक्ष्मीनिया और आसपास के कई गांव हर साल कमला बलान नदी की बाढ़ से सबसे अधिक प्रभावित होते हैं. नदी का जलस्तर बढ़ने की आशंका के बीच निचले इलाकों के लोगों की चिंता भी बढ़ गई है. बाढ़ का पानी फैलने के बाद हजारों परिवारों को घर छोड़कर तटबंध पर शरण लेनी पड़ती है.
तटबंध पर गुजरती है हजारों लोगों की जिंदगी
कमला बलान तटबंध के पेट में बसे इटहर, चौकिया, लक्ष्मीनिया, बसबरिया, समौरा, तिलकेश्वर, सुघराईन और उसरी पंचायत के लोग हर वर्ष बाढ़ की त्रासदी झेलते हैं. घरों में पानी घुस जाने के बाद परिवार अपने पशुओं और जरूरी सामान के साथ तटबंध पर अस्थायी टेंट लगाकर रहने को मजबूर हो जाते हैं. ऐसे समय में प्रशासन की ओर से संचालित सामुदायिक किचन ही उनके भोजन का प्रमुख सहारा बनता है.
नाव और चचरी पुल के सहारे हो रहा आवागमन
बाढ़ के दौरान गांवों का संपर्क बाजार, अस्पताल और पंचायत मुख्यालय से लगभग कट जाता है. लोगों को नाव या बांस-बल्ली से बने अस्थायी चचरी पुल के सहारे जान जोखिम में डालकर आवागमन करना पड़ता है. स्कूलों में पढ़ाई प्रभावित होती है, जबकि बीमार मरीजों को इलाज के लिए नाव से लंबी दूरी तय करनी पड़ती है.
ग्रामीणों ने उठाई स्थायी समाधान की मांग
स्थानीय लोगों का कहना है कि हर साल बाढ़ आने पर राहत सामग्री बांटकर प्रशासन अपनी जिम्मेदारी पूरी मान लेता है, लेकिन स्थायी समाधान की दिशा में कोई ठोस पहल नहीं होती. ग्रामीणों ने निचले इलाकों में ऊंचे पुल, वैकल्पिक सड़क, पर्याप्त नाव और समय पर सामुदायिक किचन की व्यवस्था सुनिश्चित करने की मांग की है.
जलस्तर बढ़ा तो और गंभीर हो सकते हैं हालात
ग्रामीणों का कहना है कि यदि आने वाले दिनों में कमला बलान नदी का जलस्तर तेजी से बढ़ा तो हालात और भी गंभीर हो जाएंगे. हजारों परिवारों के सामने विस्थापन, आवागमन और आजीविका का संकट गहरा जाएगा. लोगों का कहना है कि बाढ़ अब प्राकृतिक आपदा से ज्यादा उनकी स्थायी जिंदगी का हिस्सा बन चुकी है और वे हर साल इसी संघर्ष के साथ जीवन बिताने को विवश हैं.
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