एनडीए में दिखा बिखराव, एकजुट रहा महागंठबंधन जिले से भाजपा का किला ध्वस्तछह से दो सीटों पर सिमटीराजग में दिखा समन्वय का अभावदरभंगा. विधानसभा चुनाव में राजग को यहां करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा. पूर्व के राजग (भाजपा-जदयू) नेतृत्व में जहां दस में आठ सीटों पर इसे जीत मिली थी. मात्र दो सीट पर विरोधी दल का कब्जा था, वहीं इस बार स्थिति ठीक उलट हो गयी. महज दो सीटों पर ही कमल खिल सका. इस करारी शिकस्त के वैसे तो कई कारण रहे, लेकिन इसमें सबसे प्रमुख वजह एनडीए में बिखराव रहा. वहीं महागंठबंधन की जीत के मूल में इसकी एकजुटता रही. टिकट बंटवारे से पहले से ही राजग की मुख्य पार्टी भाजपा में खटपट शुरू हो गयी थी. टिकट के दावेदारों ने अपनी उपेक्षा के लिए विरोधी स्वर बुलंद करना शुरू कर दिया. यहां से जो राजग में बिखराव आरंभ हुआ वह मतदान के दिन तक एकजुट नहीं हो सका. आश्चर्यजनक पहलू यह रहा कि इसके लिए पार्टी हाइकमान की ओर से कोई पहल भी होती नजर नहीं आयी. परिणामस्वरूप जिले में भाजपा का किला ध्वस्त हो गया. ठीक इसके विपरीत महागंठबंधन पूरी तरह एकजुट होकर मैदान में रहा. कहीं किसी तरह का अंतरविरोध नहीं दिखा. नतीजा सामने है. महगंठबंधन ने दस में से आठ सीटों पर कब्जा जमा लिया. पूरे चुनावी परिदृश्य पर अगर नजर डालें तो राजग में अंतर विरोध आरंभ से अंत तक बना रहा. विधान सभा क्षेत्र पर अलग-अलग गौर करें तो शहर में भाजपा उम्मीदवार संजय सरावगी अपनी सीट बचाये रखने में कामयाब रहे. लेकिन इस क्षेत्र से जनसंघ काल के कार्यकर्त्ता व कई बार जिलाध्यक्ष रह चुके जगदीश साह बागी मैदान में उतर गये. कहने के लिए इनसे बात की गयी, पर नतीजा सिफर ही रहा. वहीं जमीनी स्तर के विक्षुब्ध कार्यकर्त्ताओं को संतुष्ट करने की सार्थक पहल नहीं हो सकी. कहीं न कहीं जीत के अंतर में इसका प्रभाव लोग मान रहे हैं. अलीनगर विस क्षेत्र में पार्टी ने राजद से रातों-रात भाजपा में आये मिश्री लाल यादव को टिकट थमा दिया. फलत: वहां के कार्यकर्त्ता असंतुष्ट हो गये. गौड़ाबौराम में उम्मीदवार के नाम की घोषणा काफी जद्दोजहद के बाद की गयी. लोजपा की इस सीट से मुखिया बिनोद सहनी को मैदान में उतार दिया गया. ठीक इसके विपरीत महागंठबंधन ने नामांकन के लिए समर्थकों के साथ पहुंचे निवर्त्तमान जदयू विधायक डा. इजहार अहमद ने मना लिया और मैदान में उतरने से उन्हें रोक दिया. वे अपने गंठबंधन के साथ हो गये. इसका फायदा भी पार्टी को मिला. कुशेश्वरस्थान में भी काफी हद तक स्थानीय कार्यकर्त्ताओं की उपेक्षा का असर रहा. सबसे दिलचस्प माजरा तो ग्रामीण विस क्षेत्र में देखने को मिला. हम सुप्रीमो सह पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी ने तो खुले मंच से भाजपा सांसद कीर्त्ति आजाद पर राजद प्रत्याशी के पक्ष में काम करने का आरोप लगा दिया. जाले में भी राजग बिखरा-बिखरा नजर आया. हालांकि यहां भाजपा को जीत मिल गयी. दूसरी ओर एनडीए के घटक दलों के बीच आपसी तालमेल का भी पूरा अभाव नजर आया. कहीं प्रत्याशी ने कार्यकर्त्ताओं को तरजीह नहीं दी तो कहीं उपेक्षित छोड़ दिया. भाजपा की उम्मीदवारी वाली सीट पर लोजपा, हम व रालोसपा की मजबूत उपस्थिति नहीं दिखी तो जहां अन्य दलों के चिन्ह पर घटक दल के उम्मीदवार लड़ रहे थे वहां उसको छोड़ एक-दो को छोड़ दूसरे दल के कार्यकर्त्ताओं की सार्थक सक्रियता नजर नहीं आयी. इसके लिए जिला या इसके ऊपर के स्तर से कोई समन्वय की बैठक होने की भी सूचना नहीं मिली. जो बैठकें हुईं उसकी महज खानापूरी ही की गयी. भाजपा की तो पूरी जिला टीम ही फेल रही. इसका एक कारण यह भी रहा कि इसके जिलाध्यक्ष हरि सहनी खुद चुनाव मैदान में थे. ठीक इसके विपरीत महागंठबंधन में पूरी एकजुटता दिखी. कहीं से किसी तरह के अंतरविरोध तक के स्वर सुनायी नहीं पड़े. सभी सीटों पर यह गंठबंधन एक साथ नजर आया. न तो उम्मीदवारी के लिए कोई विरोध के स्वर फूटे और न ही उपेक्षा का ही कहीं से आरोप लगा. वैसे जिला में अभी भी जदयू का संगठन प्रभावी भूमिका में नजर नहीं आ रहा. इस गंठबंधन के घटक दल कांग्रेस सुस्त पड़ी नजर आयी. राजनीतिक प्रेक्षकों का कहना है कि जमीनी स्तर पर राजद संगठन ने ही प्रभाव छोड़ा. बावजूद दोनों प्रमुख दल में किसी तरह का विलगाव नहीं दिखा. इसी ने राजग को इस जिला में करारी शिकस्त देने में सफलता हासिल की.
एनडीए में दिखा बिखराव, एकजुट रहा महागंठबंधन
एनडीए में दिखा बिखराव, एकजुट रहा महागंठबंधन जिले से भाजपा का किला ध्वस्तछह से दो सीटों पर सिमटीराजग में दिखा समन्वय का अभावदरभंगा. विधानसभा चुनाव में राजग को यहां करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा. पूर्व के राजग (भाजपा-जदयू) नेतृत्व में जहां दस में आठ सीटों पर इसे जीत मिली थी. मात्र दो सीट पर […]
