कमतौल : बाढ़ में खेत पानी में डूब गये. धनरोपनी के लिए बिचड़ा लगाने की भी जमीन नहीं बची थी. लोगों को कोई उपाय नहीं सूझ रहा था. हर कोई निराश था, इसमें जाले प्रखंड के अहियारी उत्तरी के किसान रामू ने लोगों को आशा दिखायी है, साथ में भविष्य का रास्ता भी बताया है. उसके फैसले पर लोगों ने पहले मजाक उड़ाया, लेकिन वहीं लोग अब उसकी प्रशंसा कर रहे हैं.
दरअसल बाढ़ में जमीन नहीं रहने पर रामू ने घर के समीप लगाए गए गोबर और कचरे के ढ़ेर बिचड़ा गिरा दिया. किसान हरिहर ठाकुर के पुत्र रामू ठाकुर के निर्णय पर गांव के किसान जानकी रमण ठाकुर, नवीन चन्द्र ठाकुर ने माना कि मौजूदा समस्या की चिंता में डूबने के बदले भविष्य के लिए चिंतन ही शायद इस बाढ़ग्रस्त इलाके के लोगों के वजूद का प्रमाण है.
रामू ने बताया कि रहने के लिए घर है, लेकिन दरवाजा नहीं है. कुछ जमीन है भी तो वह गांव से बाहर है, जो बाढ़ की चपेट में है. बाढ़ आने के बाद कई किसानों को जहां-तहां बिचड़ा गिराते देखा, लेकिन घर के अलावा आसपास कोई जमीन नहीं थी. पर्व-त्योहार के लिए नई फसल और जाड़े के मौसम में मवेशी के ओछड़ा की चिंता सताने लगी. जद्दोजहद के बाद घर के समीप लगाए गए गोबर और कचरे के ढ़ेर पर ही बिचड़ा तैयार करने का निर्णय लिया. पूरे दिन कचरे के ढेर को समतल करने में बीता.
दूसरे दिन साफ-सफाई कर उसमें ही बिचड़ा गिरा दिया. गांव के लोगों को जब इस बात की जानकारी हुई तो कई लोगों ने मजाक भी उड़ाया, लेकिन अब जब बिचड़े रोपने लायक हो गए हैं, तो लोग देखने आ रहे हैं. खेत में पानी कम होने की प्रतीक्षा है. इतने बिचड़े से खाने लायक अनाज तो नहीं होगा. कम से कम त्योहार के लिए कुछ धान तो हो ही जाएगा. वहीं महीना-दो महीना के लिए ही पशुचारे की व्यवस्था भी हो जाएगी. और नहीं तो जाड़े में मवेशी के ओछड़ा के लिए किसी के आगे हाथ तो फैलाना नहीं पड़ेगा.
