Buxar News: ऐतिहासिक नगरी बक्सर में राष्ट्रीय गीत 'वंदे मातरम' के 150 वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष्य में अखिल भारतीय साहित्य परिषद, बक्सर की ओर से गरिमामय परिचर्चा सह काव्य-गोष्ठी का आयोजन किया गया. यह साहित्यिक संगम ज्योति प्रकाश लाइब्रेरी के समीप स्थित संस्कृत उच्च विद्यालय के प्रांगण में संपन्न हुआ. कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ साहित्यकार रामेश्वर मिश्र 'विहान' ने की, जबकि मंच का कुशल संचालन शशिभूषण मिश्र द्वारा किया गया.
उदार राष्ट्रवाद और वर्तमान परिदृश्य पर विमर्श
समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में गणेश उपाध्याय और विशिष्ट अतिथि के रूप में डॉ. अरुण मोहन भारवि तथा रामेश्वर प्रसाद वर्मा मंच पर उपस्थित रहे. परिचर्चा के दौरान डॉ. भारवि ने सत्ता और राष्ट्रवाद के बदलते स्वरूप पर गंभीर विचार साझा किए. उन्होंने कहा, "संस्कृत साहित्य में वर्णित उदार राष्ट्रवाद और वर्तमान दौर के राष्ट्रवाद में गहरा अंतर देखने को मिलता है. साहित्य हमेशा समाज को सही दिशा दिखाने और सत्ता के दागदार चरित्र को आईना दिखाने का काम करता है."
भोजपुरी और संस्कृत रचनाओं से बंधा समां
परिचर्चा के उपरांत आयोजित काव्य गोष्ठी का शुभारंभ कवि रामाधार सिंह की काव्य प्रस्तुति से हुआ. इसके बाद वरिष्ठ कवि बशिष्ठ पांडेय ने अपनी सशक्त भोजपुरी रचना के जरिए समकालीन सामाजिक विसंगतियों और समस्याओं पर तीखा प्रहार किया. कवि बद्री नारायण बक्सरी ने संस्कृत वांग्मय को आधुनिक जीवन से जोड़ते हुए अपनी भोजपुरी रामायण के चुनिंदा अंश प्रस्तुत किए, जिस पर सभागार तालियों से गूंज उठा.
स्थानीय कवियों की रचनाओं ने मोहा मन
काव्य पाठ के दौरान उमेश कुमार पाठक 'रवि' की अनूठी रचना 'पतलो का छान्ही पर होरहा भुंजाइल' विशेष आकर्षण का केंद्र बनी और श्रोताओं ने इसे खूब सराहा. इसके अतिरिक्त शिव बहादुर पांडेय 'प्रीतम', राजारमण पांडेय, प्रमोद कुमार मिश्र और रवीन्द्र कुमार मिश्र सहित अन्य आमंत्रित कवियों ने अपनी विविध भावों से भरी कविताओं से कार्यक्रम में समां बांध दिया. कार्यक्रम के अंत में परिषद के उपाध्यक्ष उमेश कुमार पाठक 'रवि' ने सभी अतिथियों, रचनाकारों और साहित्य प्रेमियों के प्रति औपचारिक धन्यवाद ज्ञापित किया.
