जीर्णोद्धार नहीं होने से साल दर साल सिमटता जा रहा सरेंजा पोखरा का आस्तित्व

सैकड़ों वर्षों से जलस्त्रोत का केंद्र रहा सरेंजा पोखरा अतिक्रमण के चलते सिमटता जा रहा है. वर्षों पहले इसी पोखरा से लोगों की प्यास बुझती थी.

चौसा. सैकड़ों वर्षों से जलस्त्रोत का केंद्र रहा सरेंजा पोखरा अतिक्रमण के चलते सिमटता जा रहा है. वर्षों पहले इसी पोखरा से लोगों की प्यास बुझती थी, परंतु आज गांव के नाले का गंदा पानी गिर रहा है. इसके जीर्णोद्धार के लिए प्रशासन व प्रतिनिधि कोई ध्यान नहीं दे रहा. पोखरा को अतिक्रमणमुक्त कराने व गाद उड़ाही के लिए चर्चा तो खूब हुए, लेकिन धरातल पर अधिकारी पोखरा को भूल गए. सरोज कुमार, विमलेश कुमार, उपेन्द्र सिंह आदि ग्रामीणों की माने तो कभी इस पोखरे के पानी से ग्रामीणों की प्यास बुझने के साथ घर-घर खाना बनाने में भी पोखरे का जल काम आता था. जिस पोखरे ने पुरखों की इतनी सेवा की, आज की पीढ़ी उसी पोखरा पर सितम ढा रहे हैं. आज तो पूरे गांव के घरों से निकलने वाला गंदा पानी इस पोखरे मे गिराये जाने से इसका पानी पशु-पक्षी की प्यास बुझाने लायक भी नही रहा है. गांव के बूढ़े-बुजुर्ग के मुताबिक इस पोखरे का निर्माण कब हुआ हम लोगों को भी पता नहीं. हालांकि, इस गांव के इतिहास से मिली जानकारी के अनुसार इस पोखरे के बगल मे सरैया नामक राजा का दीवान (कचहरी) इस टीले पर हुआ करता था. वे चेरो वंश के राजा थे. आज भी इसकी तलहटी में पुराने भवन के ईट निकलते हैं. उन्हीं के नाम से सरेंजा का नामकरण किया गया. उस समय इस गांव का नाम सिरसा गढ़ हुआ करता था. संभव है, उसी समय पोखरे का निर्माण कराया गया हो. पहले पोखरा छह एकड़ में हुआ करता था. लेकिन, आज अतिक्रमण के चलते तीन एकड़ में सिमट कर रह गया है. ग्रामीणों की मानें तो पोखरे का जीर्णोद्धार होना जरूरी है.

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

प्रभात खबर डिजिटल प्रीमियम स्टोरी

लेखक के बारे में

Published by: Amlesh prasad

Digital Media Journalist having more than 2 years of experience in life & Style beat with a good eye for writing across various domains, such as tech and auto beat.
और पढ़ें

संबंधित खबरें >

यह भी पढ़ें >