बक्सर: सावन में गायब हो गई गांवों की रौनक, मोबाइल ने छीन लिया झूले और कजरी गीतों का रंग

आधुनिकता की दौड़ में सावन के झूला और कजरी गीत धीरे-धीरे लुप्त हो रहे हैं। अपनी सांस्कृतिक धरोहर को बचाने के लिए सामूहिक प्रयासों की आवश्यकता है।

Buxar News : सावन का महीना आते ही कभी गांवों की गलियों और पेड़ों की डालियों पर झूले पड़ जाते थे. महिलाएं और युवतियां झूला झूलते हुए कजरी गीत गाती थीं और पूरा माहौल सावन की मस्ती में डूब जाता था. लेकिन आधुनिकता की तेज रफ्तार और मोबाइल-इंटरनेट के बढ़ते प्रभाव ने इस पुरानी ग्रामीण परंपरा की रंगत फीकी कर दी है.

झूले के साथ गूंजती थी कजरी की तान

कभी सावन शुरू होते ही गांवों में जगह-जगह झूले डाल दिए जाते थे. महिलाएं और लड़कियां समूह में झूला झूलतीं और सावन के पारंपरिक कजरी गीत गाती थीं. इन गीतों में बारिश, प्रेम, विरह और प्रकृति का सुंदर चित्रण होता था. कजरी की मधुर आवाज से गांव की गलियां और चौपालें गूंज उठती थीं.

मनोरंजन के साथ सामाजिक जुड़ाव का जरिया था झूला

सावन के झूले और कजरी केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं थे. इनके माध्यम से ग्रामीण समाज में आपसी मेल-जोल और सामाजिक एकता मजबूत होती थी. महिलाएं और युवतियां एक साथ जुटती थीं, जिससे सामूहिकता की भावना बढ़ती थी. सावन का यह आयोजन ग्रामीण जीवन का अभिन्न हिस्सा हुआ करता था.

मोबाइल-इंटरनेट ने बदली सावन की तस्वीर

समय के साथ गांवों में टीवी, स्मार्टफोन और इंटरनेट की पहुंच बढ़ी है. आज की युवा पीढ़ी का ज्यादातर समय मोबाइल और डिजिटल मनोरंजन में बीत रहा है. ऐसे में झूला झूलने और कजरी गाने जैसी परंपराएं धीरे-धीरे पुरानी होती जा रही हैं. कई गांवों में अब सावन के दौरान पहले जैसी रौनक और सामूहिक आयोजन देखने को नहीं मिलते.

स्कूल और गांवों में आयोजन से बच सकती है परंपरा

ग्रामीण संस्कृति से जुड़े लोगों का मानना है कि इस परंपरा को बचाने के लिए सामूहिक प्रयास जरूरी है. स्कूलों और गांवों में झूला उत्सव, कजरी गायन और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जा सकते हैं. युवाओं को भी इन परंपराओं के महत्व से परिचित कराया जाना चाहिए. यदि समय रहते प्रयास नहीं किया गया, तो झूला और कजरी जैसी लोक परंपराएं आने वाली पीढ़ियों के लिए सिर्फ किताबों और किस्सों तक सीमित होकर रह जाएंगी.


प्रभात खबर डिजिटल टॉप स्टोरी

लेखक के बारे में

By गिरिश द्विवेदी

Read More
ePaper

अपने दैनिक समाचार अनुभव को और बेहतरीन बनाएं

सिर्फ ₹399 ₹149

एक साल के लिए

आज ही सब्सक्राइब करें

संबंधित खबरें >

यह भी पढ़ें >