बक्सर में सविता कुमारी ने पीड़िया-कोहबर कला को दिलाई नई पहचान, विलुप्त होती भोजपुरी लोक कला को दिया आधुनिक मंच

Bhojpuri Folk Art Buxar : पटना की लोक चित्रकार सविता कुमारी पिछले 20 वर्षों से भोजपुरी की पारंपरिक पीड़िया और कोहबर कला को सहेज रही हैं. उन्होंने इस विलुप्त होती कला को आधुनिक मंच तक पहुंचाया है. उनके प्रयास से यह लोक कला नई पीढ़ी तक पहुंच रही है और पहचान हासिल कर रही है.

Bhojpuri Folk Art Buxar : भोजपुरी अंचल की विलुप्त होती लोक कला को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का बीड़ा पटना निवासी वरिष्ठ लोक चित्रकार सविता कुमारी ने उठाया है. पिछले करीब 20 वर्षों से वे पीड़िया और कोहबर जैसी पारंपरिक कला को सहेजने और उसे आधुनिक मंच तक पहुंचाने में जुटी हैं. उनका मानना है कि जिस तरह मिथिला पेंटिंग को वैश्विक पहचान मिली है, उसी तरह भोजपुरी लोक कला भी संरक्षण और सम्मान की हकदार है.

आरा की मिट्टी से शुरू हुआ सफर

भोजपुर जिले के आरा स्थित चित्रसेनपुर गांव में जन्मीं सविता कुमारी का बचपन से ही पारंपरिक चित्रकला से गहरा लगाव रहा. वे अपनी इस कला का श्रेय अपनी मां को देती हैं. विवाह के बाद भी उन्होंने अपनी कला को जारी रखा और पिछले दो दशकों में कई राज्य स्तरीय प्रदर्शनियों में भाग लेकर अपनी पहचान बनाई. उन्हें ‘दक्ष देशज सम्मान’ समेत कई पुरस्कार भी मिल चुके हैं. वे कहती हैं, “भोजपुरी लोक कला को पुनर्जीवित करना मेरा दायित्व है.”

Bhojpur : पीड़िया और कोहबर- परंपरा की पहचान

बक्सर, भोजपुर, सीवान, सारण, गोपालगंज और रोहतास सहित पूरे भोजपुरी क्षेत्र में शादी-विवाह और पर्व-त्योहारों के दौरान घरों की दीवारों पर चित्र बनाने की परंपरा सदियों पुरानी है. इनमें ‘पीड़िया लेखन’ और ‘कोहबर चित्र’ प्रमुख हैं.

इन चित्रों में धार्मिकता, आध्यात्मिकता, प्रकृति और प्रतीकात्मकता का अनूठा समावेश होता है. कोहबर विवाह और दांपत्य जीवन का प्रतीक है, जबकि पीड़िया भाई-बहन के पवित्र रिश्ते को दर्शाती है.

Buxar News : एक महीने तक चलता है पीड़िया पर्व

भोजपुर अंचल में पीड़िया पर्व कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा से अगहन शुक्ल प्रतिपदा तक मनाया जाता है. इस दौरान बहनें अपने भाई की लंबी उम्र के लिए व्रत रखती हैं और दीवारों पर पीड़िया चित्र बनाती हैं. गोवर्धन पूजा से इसकी शुरुआत होती है, जब महिलाएं दीवार को गोबर से लीपकर पिंडी चिपकाती हैं.

रात में सामूहिक रूप से पीड़िया गीत गाए जाते हैं, जिनमें पारिवारिक रिश्तों और सुख-समृद्धि की कामना की जाती है. अंत में पिंडी को जल में प्रवाहित कर व्रत पूर्ण किया जाता है.

Folk Art : प्राकृतिक रंगों से सजती है परंपरा

पीड़िया कला की खासियत इसके प्राकृतिक रंग हैं. सेम के पत्तों से हरा, चावल से सफेद, सिंदूर से लाल और हल्दी से पीला रंग तैयार किया जाता है. इसकी आकृतियां मानव जैसी होती हैं, जिनमें पेट बड़ा और हाथ-पैर छोटे बनाए जाते हैं. चित्रों के भीतर सूरज, चांद, हाथी, घोड़ा, डोली, तोता-मैना और कृषि जीवन से जुड़े प्रतीकों का अंकन किया जाता है. इन रेखाओं में सहजता और रचनात्मक स्वतंत्रता साफ झलकती है.

बक्सर की सभी खबरें यहां पढ़ें

परंपरा से आधुनिकता की ओर

सविता कुमारी अब पीड़िया शैली को पारंपरिक विषयों से आगे बढ़ाकर नए विषयों पर भी प्रयोग कर रही हैं. उनका मानना है कि इस कला को समय के साथ जोड़ना जरूरी है, तभी यह आने वाली पीढ़ियों तक जीवित रह पाएगी.

वे कहती हैं कि जीआई टैग मिलने से भोजपुरी कला को नई पहचान मिली है और कलाकारों को प्रोत्साहन भी मिला है. उनका लक्ष्य है कि यह लोक कला देश ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी अपनी अलग पहचान बनाए.

Also Read : बक्सर के ऐतिहासिक मंदिर को बिहार कैबिनेट में मिली मंजूरी, जेल पेरिस से होगा अलग; विकास की एंट्री का रास्ता साफ

प्रभात खबर डिजिटल प्रीमियम स्टोरी

लेखक के बारे में

Published by: Mritunjay singh

Digital Media Journalist having more than 2 years of experience in life & Style beat with a good eye for writing across various domains, such as tech and auto beat.
और पढ़ें

संबंधित खबरें >

यह भी पढ़ें >