भारतीय आलोचना के अप्रतिम व्यक्तित्व, साहित्य-चिंतक और वैचारिक मेधा के प्रतिनिधि नामवर सिंह की जन्म-शताब्दी के अवसर पर नव नालंदा महाविहार, नालंदा में आयोजित उत्सव-संगोष्ठी में उनकी आलोचनात्मक विरासत का गंभीर और व्यापक पुनर्पाठ किया गया.
वक्ताओं ने नामवर सिंह को केवल हिंदी के प्रतिष्ठित आलोचक के रूप में नहीं, बल्कि साहित्य, इतिहास, दर्शन, मिथक और आधुनिक विचार-विमर्श के बीच संवाद स्थापित करने वाले महत्त्वपूर्ण भारतीय चिंतक के रूप में देखा. समारोह का आरंभ दीप प्रज्ज्वलन एवं पुष्पार्पण से हुआ.
नामवर सिंह की आलोचना जीवन और समाज से जोड़ने वाली विचार-परंपरा : डॉ. गया सिंह
इस अवसर पर मुख्य अतिथि वरिष्ठ आलोचक एवं रचनाकार डॉ. गया सिंह ने नामवर सिंह के आलोचनात्मक व्यक्तित्व का गहन विश्लेषण प्रस्तुत करते हुए कहा कि उनकी आलोचना की सबसे बड़ी विशेषता उसकी जीवंतता थी.
वे साहित्य को संग्रहालय में रखी वस्तु की तरह नहीं, बल्कि अपने समय से निरंतर संवाद करते हुए जीवित अनुभव के रूप में देखते थे. उनकी आलोचना में साहित्यिक संवेदना और बौद्धिक कठोरता परस्पर पूरक थीं.
उन्होंने कहा कि नामवर सिंह की आलोचना को समझना साहित्य को जीवन और समाज से जोड़ने वाली विचार-परंपरा को समझना है.
उन्होंने कहा कि नामवर सिंह ने हिंदी साहित्य को व्यापक भारतीय और वैश्विक बौद्धिक संदर्भों से जोड़ने का कार्य किया. साहित्य और दर्शन को अलग-अलग खाँचों में बाँटकर नहीं देखा जा सकता.
भारतीय साहित्यिक चिंतन की अपनी स्वतंत्र वैचारिक परंपरा है, जिसे आधुनिक सिद्धांतों के साथ संवाद करते हुए उसकी अपनी सांस्कृतिक और दार्शनिक भूमि पर भी समझना आवश्यक है. इस संदर्भ में नामवर सिंह की आलोचना संवाद, असहमति और पुनर्विचार की परंपरा को आगे बढ़ाती है.
आलोचना केवल निर्णय नहीं, रचनात्मक कर्म है : प्रो. सिद्धार्थ सिंह
अध्यक्षता करते हुए कुलपति प्रो. सिद्धार्थ सिंह ने कहा कि नामवर सिंह की आलोचना में परंपरा और आधुनिकता का संबंध किसी सरल विरोध के रूप में नहीं था.
वे परंपरा को वर्तमान से संवाद करने वाली जीवंत शक्ति और आधुनिकता को प्रश्न, पुनर्विचार तथा बौद्धिक उत्तरदायित्व की क्षमता के रूप में देखते थे.
उन्होंने कहा कि नामवर सिंह की आलोचना पाठक को तैयार निष्कर्ष नहीं देती, बल्कि उसे सोचने और प्रश्न करने के लिए विवश करती है.
उन्होंने यह भी कहा कि आलोचना स्वयं एक रचनात्मक कर्म है. आलोचक का कार्य केवल किसी रचना को अच्छा या बुरा घोषित करना नहीं, बल्कि उसके भीतर सक्रिय इतिहास, समाज, संवेदना और विचार को पहचानना है.
इसी कारण नामवर सिंह की आलोचना ने साहित्यिक बहस को जीवित रखा और हिंदी साहित्य में एक विशिष्ट बौद्धिक परंपरा का निर्माण किया है.
आलोचना निर्णय नहीं, रचना के अर्थ-संसार में प्रवेश की प्रक्रिया है : प्रो. परिचय दास
प्रस्तावना में प्रो. रवींद्र नाथ श्रीवास्तव ‘परिचय दास’ ने कहा कि नामवर सिंह के लिए आलोचना रचना पर बाहर से लिया गया निर्णय नहीं, बल्कि रचना के भीतर प्रवेश कर उसके अर्थ-संसार, समय, समाज और मनुष्य की जटिलताओं को समझने की प्रक्रिया थी.
उन्होंने कहा कि नामवर सिंह ने साहित्य को किसी एक विचारधारा या पूर्वनिर्धारित निष्कर्ष की बंद व्यवस्था बनने से बचाया.
उसे प्रश्नों, बहसों तथा निरंतर पुनर्विचार की जीवित भूमि बनाए रखा. उनके लिए साहित्य न तो केवल सौंदर्य का एकांत प्रदेश था और न विचारधारा का घोषणापत्र, बल्कि मनुष्य और समय के बीच चलने वाला जटिल संवाद था.
उन्होंने व्याख्यान में यह रेखांकित किया कि नामवर सिंह की आलोचनात्मक दृष्टि साहित्य को व्यापक सामाजिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संदर्भों में देखती थी.
उनके चिंतन में इतिहास और मिथक, साहित्य और दर्शन, रचनात्मकता और आलोचना तथा परंपरा और आधुनिकता के बीच गहरे अंतर्संबंध दिखाई देते हैं. वक्ताओं ने कहा कि मिथक को केवल अतीत की कथा या धार्मिक आख्यान मानना उसके व्यापक सांस्कृतिक अर्थ को सीमित करना है.
मिथक सामूहिक स्मृति, सांस्कृतिक अनुभव और ऐतिहासिक चेतना के बीच एक महत्त्वपूर्ण सेतु का कार्य करता है.
कार्यक्रम का संचालन और समापन
कार्यक्रम का शुभारंभ डॉ. धम्मज्योति के मंगल पाठ तथा डॉ. नरेंद्र दत्त तिवारी के स्वस्ति-वाचन से किया गया.
कार्यक्रम का संचालन विकास सिंह ने किया और धन्यवाद ज्ञापन सुश्री शिवानी जायसवाल ने किया.
वक्ताओं ने कहा कि नामवर सिंह की जन्म-शताब्दी केवल स्मरण का अवसर नहीं, बल्कि उनके विचारों के पुनर्पाठ का अवसर है.
उनकी वास्तविक विरासत प्रश्न करने, बहस करने और साहित्य को व्यापक मानवीय संदर्भों में देखने की आलोचनात्मक परंपरा में निहित है. हर गंभीर पाठ और हर नए प्रश्न के साथ यह विरासत आज भी पुनर्जीवित होती है.
