नालंदा में तपती गर्मी में इस फल को खाने का बढ़ रहा क्रेज, दुकानों पर उमड़ रही खरीददारों की भीड़

Nalanda News : भीषण गर्मी के बीच बिहारशरीफ में इन दिनों कोवा (ताड़गोला) लोगों की पहली पसंद बन गया है. शहर के प्रमुख चौक-चौराहों और सड़कों के किनारे लगी अस्थायी दुकानों पर सुबह से शाम तक खरीदारों की भीड़ देखी जा रही है.

Nalanda News : (कंचन कुमार की रिपोर्ट) भीषण गर्मी के बीच बिहारशरीफ में इन दिनों कोवा (ताड़गोला) लोगों की पहली पसंद बन गया है. शहर के प्रमुख चौक-चौराहों और सड़कों के किनारे लगी अस्थायी दुकानों पर सुबह से शाम तक खरीदारों की भीड़ देखी जा रही है. गर्मी से राहत देने वाले इस मौसमी फल की मांग लगातार बढ़ रही है.

वी-टू मॉल से स्टेशन रोड तक कोवा की धूम

वी-टू मॉल, सोहनकुआ, एतवारी बाजार, स्टेशन रोड और सोहसराय समेत कई इलाकों में कोवा की बिक्री तेजी से बढ़ी है. सड़क किनारे सजी दुकानों पर लोग रुककर कोवा खरीद रहे हैं. विक्रेताओं का कहना है कि पिछले कुछ दिनों में बिक्री में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई है.

नई पीढ़ी को भा रहा ताड़गोला

मध्य मई से मध्य जून तक मिलने वाला कोवा युवाओं और बच्चों के बीच खासा लोकप्रिय हो रहा है. इसके मीठे स्वाद और प्राकृतिक ठंडक के कारण नई पीढ़ी इसे उत्साह के साथ खरीद रही है. कई लोग पहली बार इसका स्वाद लेने के लिए भी दुकानों तक पहुंच रहे हैं.

महज 15 रुपये में मिल रहे तीन पीस

विक्रेताओं के अनुसार शहर में कोवा की मांग ग्रामीण इलाकों की तुलना में अधिक है. वर्तमान में लगभग 15 रुपये में तीन पीस कोवा बेचा जा रहा है. हालांकि अलग-अलग स्थानों पर इसकी कीमत में थोड़ा अंतर देखने को मिल रहा है.

बाजारों से गायब हो रहे देसी फल

एक ओर कोवा की मांग बढ़ रही है, वहीं दूसरी ओर जामुन, तूत, फालसा और जलेबी फल जैसे पारंपरिक देसी फल बाजारों में कम दिखाई दे रहे हैं. कभी गर्मी के मौसम की पहचान रहे ये फल अब धीरे-धीरे लोगों की पहुंच से दूर होते जा रहे हैं.

स्वास्थ्य के लिए खजाना थे पारंपरिक फल

ग्रामीण बुजुर्गों का कहना है कि देसी फल स्वाद के साथ स्वास्थ्य के लिए भी बेहद लाभकारी होते थे. फालसा लू से बचाव में मददगार माना जाता है, जबकि जामुन पाचन और मधुमेह नियंत्रण में उपयोगी समझा जाता है. तूत भी पोषक तत्वों का अच्छा स्रोत माना जाता है.

संरक्षण नहीं हुआ तो मिट जाएगी पहचान

विशेषज्ञों का मानना है कि शहरीकरण, देसी पेड़ों की कटाई और बदलती जीवनशैली के कारण पारंपरिक फलों का अस्तित्व खतरे में पड़ गया है. हाइब्रिड खेती और फास्ट फूड संस्कृति ने भी इनके महत्व को कम किया है. समय रहते संरक्षण नहीं किया गया तो बिहार की पारंपरिक फल संस्कृति धीरे-धीरे इतिहास बन सकती है.

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Published by: Vivek Singh

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