नालंदा का बिहारशरीफ बना क्षेत्रीय हेल्थ हब, इलाज हुआ महंगा – दवाओं के बढ़ते दाम से आम मरीज परेशान

Nalanda News : नालंदा का बिहारशरीफ़ आसपास के कई जिलों के मरीजों के लिए बड़ा हेल्थ हब बनकर उभरा है. शहर में विशेषज्ञ डॉक्टरों, निजी क्लीनिकों और आधुनिक जांच केंद्रों की संख्या लगातार बढ़ रही है. लेकिन स्वास्थ्य सेवाओं के इस विस्तार के साथ इलाज का खर्च भी आम लोगों की पहुंच से बाहर होता जा रहा है. सबसे ज्यादा परेशानी गरीब और मध्यम वर्गीय परिवारों को झेलनी पड़ रही है.

Nalanda News : (कंचन कुमार) नालंदा का बिहारशरीफ़ आसपास के कई जिलों के मरीजों के लिए बड़ा हेल्थ हब बनकर उभरा है. शहर में विशेषज्ञ डॉक्टरों, निजी क्लीनिकों और आधुनिक जांच केंद्रों की संख्या लगातार बढ़ रही है. लेकिन स्वास्थ्य सेवाओं के इस विस्तार के साथ इलाज का खर्च भी आम लोगों की पहुंच से बाहर होता जा रहा है. सबसे ज्यादा परेशानी गरीब और मध्यम वर्गीय परिवारों को झेलनी पड़ रही है.

सामान्य बीमारी में भी हजारों का खर्च, मरीज परेशान

जिले में एलर्जी, हृदय, किडनी, लीवर, सांस, मधुमेह और मानसिक रोगों के मरीज तेजी से बढ़ रहे हैं. ऐसे में अधिकतर लोग निजी अस्पतालों और क्लीनिकों पर निर्भर हैं. जिले में करीब 800 से 1200 मेडिकल स्टोर और 500 से 900 निजी क्लीनिक संचालित हो रहे हैं. अनुमान है कि हर महीने 30 से 80 करोड़ रुपये तक की दवाओं की बिक्री हो रही है, जबकि प्रतिदिन 20 से 40 हजार मरीज निजी क्लीनिकों में पहुंच रहे हैं.

डॉक्टरों की फीस में भारी उछाल, जांच ने बढ़ाया बोझ

विशेषज्ञों के अनुसार पिछले दस वर्षों में इलाज की लागत करीब चार गुना तक बढ़ गई है. पहले सामान्य बीमारी का इलाज 100 से 150 रुपये में हो जाता था, लेकिन अब डॉक्टरों की परामर्श फीस 400 से 800 रुपये तक पहुंच चुकी है. कई विशेषज्ञ डॉक्टरों की फीस छह महीने से एक वर्ष के भीतर 500 रुपये से बढ़कर 1200 रुपये तक हो गई है. मरीजों का आरोप है कि कई बार सामान्य बीमारी में भी अनावश्यक जांच कराई जाती है, जिससे आर्थिक बोझ और बढ़ जाता है.

महंगी दवाओं ने बढ़ाई चिंता, मरीजों ने लगाए आरोप

मरीजों का कहना है कि कुछ चिकित्सक अपने पसंदीदा मेडिकल स्टोर से ही दवा खरीदने का दबाव बनाते हैं. इससे सस्ते विकल्प सीमित हो जाते हैं. कई जगह बिना बिल दवा बिक्री और मनमाने दाम वसूलने की शिकायतें भी सामने आ रही हैं. हालांकि सरकार की जन औषधि योजना के तहत सस्ती दवाएं उपलब्ध हैं, लेकिन जागरूकता की कमी के कारण लोगों को इसका पूरा लाभ नहीं मिल पा रहा है.

गंभीर बीमारी में ग्रामीण परिवारों पर टूट रहा आर्थिक संकट

ग्रामीण इलाकों में स्वास्थ्य व्यवस्था की स्थिति और अधिक चिंताजनक बताई जा रही है. गंभीर बीमारी या दुर्घटना की स्थिति में कई परिवारों को गहने बेचने, जमीन गिरवी रखने और ऊंचे ब्याज पर कर्ज लेने तक की नौबत आ रही है. आर्थिक रूप से कमजोर परिवार इलाज के खर्च से सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं.

बड़े शहरों के डॉक्टरों की बढ़ी मौजूदगी, लेकिन महंगा हुआ इलाज.

बिहारशरीफ लंबे समय से विशेषज्ञ चिकित्सकों का केंद्र रहा है. अब पटना, मुजफ्फरपुर, भागलपुर और दिल्ली के बड़े अस्पतालों से जुड़े डॉक्टर भी सप्ताह में एक-दो दिन यहां आकर मरीजों का इलाज कर रहे हैं. इससे लोगों को सुविधा तो मिली है, लेकिन इलाज का खर्च भी तेजी से बढ़ गया है.

अरबों खर्च के बाद भी सरकारी अस्पतालों की हालत कमजोर

सरकार ने पिछले कुछ वर्षों में भगवान महावीर मेडिकल कॉलेज अस्पताल, सदर अस्पताल बिहारशरीफ, डेंटल मेडिकल कॉलेज भागन बिगहा, राजगीर और हिलसा अनुमंडल अस्पताल समेत कई स्वास्थ्य संस्थानों पर अरबों रुपये खर्च किए हैं. आधुनिक मशीनें, ऑक्सीजन प्लांट और स्वास्थ्यकर्मियों की नियुक्ति भी की गई है. इसके बावजूद अधिकांश सरकारी अस्पतालों में केवल सामान्य इलाज ही उपलब्ध हो पा रहा है.

गंभीर मरीज अब भी निजी अस्पतालों पर निर्भर

गंभीर मामलों में मरीजों को अक्सर बड़े शहरों या निजी अस्पतालों के लिए रेफर कर दिया जाता है. कई सरकारी अस्पतालों में जांच सेवाएं भी नियमित नहीं चल पा रही हैं. कभी तकनीशियन की कमी तो कभी केमिकल के अभाव में मरीजों को निजी जांच केंद्रों का सहारा लेना पड़ता है. स्वास्थ्य व्यवस्था से जुड़े सूत्रों का आरोप है कि कई चिकित्सक सरकारी अस्पतालों में कम समय देते हैं, जबकि निजी क्लीनिकों में अधिक सक्रिय रहते हैं.

बढ़ती महंगाई के बीच सस्ता इलाज बनता जा रहा सपना

स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार जरूर हुआ है, लेकिन इलाज की बढ़ती लागत ने आम मरीजों की चिंता बढ़ा दी है. यदि समय रहते सरकारी व्यवस्था को मजबूत करने और निजी स्वास्थ्य सेवाओं पर प्रभावी निगरानी के ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले समय में बेहतर इलाज आम लोगों की पहुंच से और दूर हो सकता है.

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Published by: Vivek Singh

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