Land Records : 5 साल बाद भी नालंदा में नहीं शुरू हुई डाक से जमीन के दस्तावेज घर पहुंचाने की सुविधा, दफ्तरों के चक्कर लगा रहे रैयत

बिहार में जमीन के दस्तावेज डाक से घर भेजने की सरकारी योजना पांच साल बाद भी शुरू नहीं हो सकी है, इसके बाद भी नालंदा में यह सुविधा पांच साल बाद भी अधूरी है. इसके चलते लोग अभी भी सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटने को मजबूर हैं. जानें इस देरी के पीछे की वजह.

Land Documents Post by Postman : बिहारशरीफ. जमीन के दस्तावेज हासिल करने के लिए आम लोगों को अंचल कार्यालय और रिकॉर्ड रूम के चक्कर लगाने से राहत देने की सरकारी योजना पांच साल बाद भी नालंदा में पूरी तरह लागू नहीं हो सकी है. वर्ष 2021 में राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग ने आधुनिक अभिलेखागार-सह-डाटा सेंटर के माध्यम से रैयतों को जमीन से जुड़े दस्तावेजों की प्रतिलिपि डाक से उनके घर तक पहुंचाने की पहल की थी. इसके लिए नियमावली और मानक संचालन प्रक्रिया यानी एसओपी भी तैयार की गयी थी, लेकिन 150 रुपये शुल्क जमा कर घर बैठे जमीन का नक्शा समेत 26 तरह के दस्तावेज मंगाने की सुविधा अब तक शुरू नहीं हो सकी है.

योजना का उद्देश्य जमीन के रिकॉर्ड को डिजिटल बनाने के साथ रैयतों को दस्तावेज प्राप्त करने की प्रक्रिया आसान बनाना था. व्यवस्था लागू होने के बाद जमीन मालिक को किसी दस्तावेज की जरूरत पड़ने पर बार-बार कार्यालय जाने की जरूरत नहीं पड़ती. आवेदन और निर्धारित शुल्क जमा करने के बाद संबंधित अभिलेख की प्रतिलिपि डाक के माध्यम से उनके पते पर भेजी जानी थी.

26 प्रकार के जमीन रिकॉर्ड को डिजिटल करने की थी तैयारी

राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग की योजना के तहत आधुनिक रिकॉर्ड रूम में जमीन और राजस्व से जुड़े 26 प्रकार के दस्तावेजों को डिजिटल स्वरूप में सुरक्षित किया जाना था. इनमें खतियान, नक्शा, रजिस्टर-टू समेत अन्य महत्वपूर्ण अभिलेख शामिल हैं.

दस्तावेजों को डिजिटल करने की प्रक्रिया भी शुरू की गयी थी, ताकि जरूरत पड़ने पर रिकॉर्ड को आसानी से खोजा और उपलब्ध कराया जा सके. हालांकि, अभी सभी दस्तावेज ऑनलाइन उपलब्ध नहीं हो सके हैं. कुछ अभिलेखों को डिजिटल किया गया है, लेकिन रैयतों को इन दस्तावेजों की प्रतिलिपि डाक के माध्यम से उनके घर तक पहुंचाने की सुविधा अब तक शुरू नहीं हुई है.

डाक से घर तक पहुंचना था दस्तावेज

वर्ष 2021 में तैयार नियमावली के अनुसार रिकॉर्ड रूम में सुरक्षित दस्तावेजों की प्रतिलिपि रैयतों को डाक के माध्यम से उपलब्ध कराने की व्यवस्था की जानी थी. इसके लिए निर्धारित शुल्क जमा कर आवेदन करने पर जमीन मालिक को संबंधित दस्तावेज उसके पते पर भेजे जाने थे. व्यवस्था लागू होने पर रैयतों को दस्तावेज के लिए बार-बार अंचल कार्यालय या रिकॉर्ड रूम का चक्कर लगाने से राहत मिलती.

150 रुपये शुल्क देकर घर बैठे दस्तावेज मिलने थे

निर्धारित 150 रुपये शुल्क का भुगतान कर आवेदन करने पर जमीन का संबंधित दस्तावेज और नक्शा डाक से रैयत के पते पर भेजने की व्यवस्था की जानी थी.

कंप्यूटर, प्रिंटर और स्कैनर भी उपलब्ध कराए गए

आधुनिक अभिलेखागार-सह-डाटा सेंटर को व्यवस्थित तरीके से संचालित करने के लिए रिकॉर्ड रूम में आवश्यक संसाधन उपलब्ध कराने की योजना बनायी गयी थी. इसके तहत प्रत्येक रिकॉर्ड रूम में चार-चार कंप्यूटर, प्रिंटर और स्कैनर समेत अन्य उपकरण उपलब्ध कराने का प्रावधान किया गया था.

CCTV से रिकॉर्ड रूम की निगरानी

रिकॉर्ड रूम के कार्यों की निगरानी सीसीटीवी कैमरों के माध्यम से किए जाने का भी प्रावधान रखा गया था. जहां आधुनिक रिकॉर्ड रूम तैयार हो गए, वहां डाटा इंट्री ऑपरेटरों की नियुक्ति भी बेल्ट्रॉन के माध्यम से की गई. अपर समाहर्ता को आधुनिक रिकॉर्ड रूम का नोडल अधिकारी बनाया गया.

SOP में तय थी पूरी प्रक्रिया

एसओपी में आवेदन से लेकर दस्तावेज भेजने तक की प्रक्रिया निर्धारित की गई थी. इसमें यह भी तय किया गया था कि अलग-अलग दस्तावेजों के लिए कितना शुल्क लिया जाएगा, आवेदन के बाद कितने समय में रिकॉर्ड उपलब्ध कराया जाएगा और आवेदन के साथ जमीन मालिक को कौन-कौन से कागजात जमा करने होंगे.

यदि निर्धारित समय पर दस्तावेज उपलब्ध नहीं कराया जाता, तो रैयत अपनी शिकायत कहां दर्ज करा सकेगा, इसकी व्यवस्था भी एसओपी में की गई थी. इसके बावजूद यह सुविधा जमीन मालिकों तक नहीं पहुंच पाई है.

कागजों में व्यवस्था

योजना शुरू होने के करीब पांच साल बाद भी जमीन के दस्तावेज घर बैठे डाक से मंगाने की सुविधा शुरू नहीं हो पाना सवाल खड़े करता है. सरकार का उद्देश्य रिकॉर्ड को डिजिटल करने और रैयतों के लिए दस्तावेज प्राप्त करना आसान बनाने का था, लेकिन सुविधा पूरी तरह लागू नहीं होने के कारण जमीन मालिकों की परेशानी खत्म नहीं हुई है.

सुविधा के इंतजार में रैयत

आज भी किसी जमीन के पुराने रिकॉर्ड, खतियान, नक्शा या अन्य अभिलेख की जरूरत पड़ने पर रैयतों को संबंधित कार्यालयों और रिकॉर्ड रूम का रुख करना पड़ता है. इससे समय और पैसे दोनों खर्च होते हैं. खासकर दूरदराज के इलाकों में रहने वाले लोगों के लिए दस्तावेज प्राप्त करने की प्रक्रिया और अधिक परेशानी वाली हो जाती है.

आधुनिक अभिलेखागार और डिजिटल रिकॉर्ड की व्यवस्था तैयार होने के बावजूद यदि दस्तावेज घर तक पहुंचाने की सुविधा शुरू नहीं होती है, तो योजना का बड़ा उद्देश्य अधूरा रह जाता है. अब रैयतों को इस सुविधा के वास्तविक रूप से शुरू होने का इंतजार है, ताकि जमीन के कागजात के लिए उन्हें बार-बार सरकारी दफ्तरों का चक्कर न लगाना पड़े.


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लेखक के बारे में

By कंचन कुमार

कंचन कुमार वर्ष 2009 से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं. उत्तराखंड से शुरुआत करने के बाद दिल्ली, उत्तर प्रदेश, पटना, नवादा और बिहारशरीफ में विभिन्न मीडिया संस्थानों के साथ कार्य किया. पिछले 12 वर्षों से प्रभात खबर बिहारशरीफ कार्यालय में नालंदा जिला रिपोर्टर के रूप में कार्यरत हैं. जिला प्रशासन, खोजी एवं विशेष रिपोर्ट, जमीनी पड़ताल, विकास, जनसरोकार के मुद्दों तथा लोकसभा और विधानसभा चुनावों के गहन विश्लेषण के लिए उनकी विशेष पहचान है.

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