बौद्ध दर्शन से शांति और सहयोग का संदेश : कुलपति

प्रतिनिधि, राजगीर. बुद्ध पूर्णिमा के अवसर पर नालंदा विश्वविद्यालय ने न्यूयॉर्क में उच्चस्तरीय अंतरराष्ट्रीय संवादों में भागीदारी के माध्यम से अपनी बढ़ती वैश्विक संलग्नता को चिह्नित किया, जिसमें संयुक्त राष्ट्र में अंतरराष्ट्रीय ‘वेसाक’ दिवस कार्यक्रम के साथ-साथ नेपाल में भारतीय दूतावास द्वारा आयोजित कार्यक्रम में सहभागिता रही.

प्रतिनिधि, राजगीर. बुद्ध पूर्णिमा के अवसर पर नालंदा विश्वविद्यालय ने न्यूयॉर्क में उच्चस्तरीय अंतरराष्ट्रीय संवादों में भागीदारी के माध्यम से अपनी बढ़ती वैश्विक संलग्नता को चिह्नित किया, जिसमें संयुक्त राष्ट्र में अंतरराष्ट्रीय ‘वेसाक’ दिवस कार्यक्रम के साथ-साथ नेपाल में भारतीय दूतावास द्वारा आयोजित कार्यक्रम में सहभागिता रही. नालंदा विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो सचिन चतुर्वेदी ने न्यूयॉर्क स्थित संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में आयोजित अंतरराष्ट्रीय ‘वेसाक’ दिवस समारोह में “वैश्विक शांति और सहयोग को सशक्त बनाने हेतु बौद्ध विरासत का उपयोग” विषय पर मुख्य भाषण दिया. अपने भाषण में प्रो चतुर्वेदी ने बौद्ध दर्शन की समकालीन वैश्विक चुनौतियों के समाधान में स्थायी प्रासंगिकता पर बल दिया, जिसमें परस्पर निर्भरता, सामूहिक कल्याण तथा नैतिक विकास को वैश्विक शासन की आधारशिला के रूप में रेखांकित किया. विश्व की प्रथम आवासीय अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय ‘नालंदा’ की ऐतिहासिक विरासत का उल्लेख करते हुए उन्होंने इसके पुनरुद्धार को संस्कृतियों एवं राष्ट्रों के मध्य संवाद को प्रोत्साहित करने वाले जीवंत सभ्यतागत पुल के रूप में चित्रित किया. सतत विकास लक्ष्यों (एसडीजी) में समर्पित सांस्कृतिक लक्ष्य की अनुपस्थिति को रेखांकित करते हुए उन्होंने कहा कि संस्कृति वैश्विक विकास एजेंडे का “अभावग्रस्त आधार” बनी हुई है. 2030 के बाद के विकास रूप-रेखा की आवश्यकता पर जोर देते हुए उन्होंने संस्कृति एवं नैतिकता को सतत एवं समावेशी वैश्विक प्रगति के संरचनात्मक स्तंभों के रूप में एकीकृत करने का आह्वान किया. प्रतीत्यसमुत्पाद, सम्यक आजीविका तथा जगत हित जैसे प्रमुख बौद्ध संकल्पनों को रेखांकित करते हुए प्रोफेसर चतुर्वेदी ने एक ऐसा फ्रेमवर्क प्रस्तुत किया जिसमें शांति मात्र संघर्ष की अनुपस्थिति नहीं, अपितु नैतिक चेतना एवं साझा उत्तरदायित्व का परिणाम है. उन्होंने आगे जोर दिया कि बौद्ध विरासत – चाहे कलात्मक हो या दार्शनिक – बहुपक्षीय सहयोग एवं सांस्कृतिक समझ को सशक्त बनाने वाला एक महत्वपूर्ण वैश्विक साझा संपदा का रूप है. ‘वेसाक’ समारोह के दौरान पर नालंदा विश्वविद्यालय के प्रतिनिधिमंडल ने संयुक्त राष्ट्र में भारतीय मिशन की उप-स्थायी प्रतिनिधि एवं राजदूत योजना पटेल से भी भेंट की तथ इस महत्वपूर्ण संवाद को सुगम बनाने में उनके सहयोग की सराहना की. इस आयोजन में भूटान, कंबोडिया, जापान, लाओस, मंगोलिया, नेपाल, कोरिय, श्रीलंका तथा वियतनाम के स्थायी मिशन सहित अनेक सदस्य राष्ट्रों की सक्रिय और महत्वपूर्ण भागीदारी रही. इसके पश्चात, न्यूयॉर्क स्थित भारत के महावाणिज्य दूतावास ने नालंदा विश्वविद्यालय के सहयोग से बौद्ध धर्म पर एक विशिष्ट राउंडटेबल का आयोजन किया, जिसमें अमेरिका के कई प्रमुख स्कॉलर एवं शैक्षणिकजनों ने भी भाग लिया. प्रोफेसर सचिन चतुर्वेदी के नेतृत्व में नालंदा प्रतिनिधिमंडल ने विश्वविद्यालय में चल रहे अनुसंधान, शैक्षणिक पहलों तथा साझा सभ्यतागत ज्ञान परंपराओं पर आधारित अर्थपूर्ण अंतरराष्ट्रीय सहयोगों को प्रोत्साहन देने की प्रतिबद्धता का व्यापक अवलोकन प्रस्तुत किया. सभी शामिल विद्वानों ने नालंदा के वैश्विक अधिगम केंद्र के रूप में पुनरुत्थान के प्रयासों की सराहना की तथा शैक्षणिक साझेदारियों को और सशक्त बनाने पर समृद्ध चर्चा में भाग लिया. नालंदा विश्वविद्यालय ने इस आयोजन के सफलता के लिए, न्यूयॉर्क में भारत के महावाणिज्य दूत विनय एस. प्रधान के सहयोग हेतु उनका आभार प्रकट किया. इसी सन्दर्भ में, नेपाल में एक आयोजन में नालंदा विश्वविद्यालय के सहायक प्रोफेसर डॉ. प्रांशु समदर्शी को काठमांडू में भारत दूतावास द्वारा लुंबिनी बौद्ध विश्वविद्यालय में आयोजित शैक्षणिक सेमिनार को संबोधित करने हेतु आमंत्रित किया गया. बुद्ध की जन्मस्थली पर आयोजित इस कार्यक्रम में उन्होंने भारत एवं नेपाल के मध्य गहन सभ्यतागत अंतर्संबंधों तथा परस्पर निर्भरता को समझने के साधन के रूप में बौद्ध दार्शनिक रूप-रेखा पर बल दिया. उन्होंने उल्लेख किया कि बौद्ध धर्म की साझा विरासत समरसता, सहयोग तथा सतत विकास को प्रोत्साहित करने का गहन आधार प्रदान करती है, जो दोनों देशों के मध्य संलग्नता को और सशक्त बनाते हुए सहयोगी विकास को उन्नत कर सकती है.

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By SANTOSH KUMAR SINGH

SANTOSH KUMAR SINGH is a contributor at Prabhat Khabar.

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