Bihar Politics: बांका से सांसद गिरिधारी यादव की लोकसभा सदस्यता को रद्द करने को लेकर जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) द्वारा लोकसभा स्पीकर को नोटिस दिए जाने के बावजूद उनकी सांसदी पर खतरा टलता नजर आ रहा है. उनकी सदस्यता रद्द होने की संभावना बेहद कम है, क्योंकि संविधान के दलबदल विरोधी कानून के तहत यह मामला सीधे पार्टी के निर्णय पर नहीं चल सकता.
संविधान के जानकारों और कानूनी एक्सपर्ट की मानें तो जेडीयू की यह राह इतनी आसान नहीं दिख रही है. कानून और सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का कवच गिरिधारी यादव की सांसदी के लिए ‘संजीवनी’ साबित हो सकता है.
दलबदल विरोधी कानून के पेंच में उलझा मामला
लोकसभा सदस्यता रद्द करने का अधिकार सीधे पार्टी के पास नहीं होता. संविधान की 10वीं अनुसूची, जिसे दलबदल विरोधी कानून कहा जाता है, केवल उन स्थितियों में सदस्यता खत्म कर सकती है जब कोई सदस्य खुद पार्टी छोड़ दे या पार्टी के व्हिप के खिलाफ वोट करे. इन मामलों में अंतिम निर्णय लोकसभा अध्यक्ष का होता है और वे नियमों से बंधे होते हैं.
सुप्रीम कोर्ट ने जी. विश्वनाथन और अमर सिंह के मामलों में स्पष्ट किया था कि यदि पार्टी किसी सांसद को निष्कासित कर दे, तब भी वह अपनी मूल पार्टी का सदस्य माना जाता है, जब तक वह किसी अन्य दल में शामिल नहीं होता. ऐसे में सांसद सदन में अनअटैच्ड सदस्य के रूप में बने रहते हैं. यह निर्णय गिरिधारी यादव के पक्ष में मजबूत आधार तैयार करता है.
अमर सिंह और विश्वनाथन केस का हवाला
गिरिधारी यादव के मामले में सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसले उनके सबसे बड़े रक्षक बन सकते हैं. जी. विश्वनाथन और अमर सिंह के चर्चित मामलों में शीर्ष अदालत ने साफ किया है कि यदि कोई पार्टी अपने सांसद को निष्कासित भी कर देती है, तो भी वह सदन में ‘अनअटैच्ड’ सदस्य के रूप में बना रहता है.
जब तक सांसद आधिकारिक तौर पर किसी दूसरे दल की सदस्यता ग्रहण नहीं कर लेता, तब तक उसकी कुर्सी को खतरा नहीं होता. ऐसे में जेडीयू का नोटिस केवल एक राजनीतिक दबाव बनाने का जरिया बनकर रह सकता है.
राजनीति में बेटे के खिलाफ चुनाव लड़े जाने का मुद्दा
जेडीयू ने गिरिधारी यादव के बेटे पर यह आरोप लगाया है कि उन्होंने 2025 विधानसभा चुनाव में राजद के टिकट पर चुनाव लड़ा था. यह आरोप पार्टी की नाराजगी का कारण बना है, लेकिन यह पहला मौका नहीं है जब किसी नेता के परिजन ने दूसरे दल से चुनाव लड़ा हो. 2024 में महेश्वर हजारी और अशोक चौधरी के परिजनों ने भी अन्य दलों से चुनाव लड़ा था, इसके बावजूद उनपर कोई कार्रवाई नहीं हुई.
जेडीयू का नोटिस राजनीतिक दबाव जरूर बनाता है और संगठन में अनुशासन का संदेश देता है. लेकिन कानून और सुप्रीम कोर्ट के प्रीसेडेंट के आधार पर गिरिधारी यादव की लोकसभा सदस्यता सुरक्षित दिखाई देती है.
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