क्या 100 साल पहले बिहार आए लोग बाहरी हैं? पंचायत चुनाव आरक्षण पर हाईकोर्ट ने क्या फैसला दिया

Bihar Panchayat Election Reservation: पटना हाईकोर्ट ने आरक्षण को लेकर फैसला सुनाया है. कोर्ट ने साफ कर दिया कि जिनके पूर्वज 100 या 125 साल पहले बिहार आकर बस गए थे, उन्हें बाहरी मानकर आरक्षण से रोका नहीं जा सकता. इस फैसले से सहरसा के मुखिया की कुर्सी वापस मिल गई है.

Bihar Panchayat Election Reservation: बिहार पंचायत चुनाव में आरक्षण को लेकर पटना हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है. कोर्ट ने साफ कहा कि जिस परिवार के पूर्वज 100 साल से भी ज्यादा समय पहले बिहार आकर बस गए हों, उसे सिर्फ इस आधार पर बिहार से बाहर का निवासी नहीं माना जा सकता. ऐसे परिवार को आरक्षण के लाभ से वंचित नहीं किया जा सकता.

पंचायत चुनाव में कौन सा कानून लागू होगा

हाईकोर्ट ने कहा कि पंचायत चुनाव में आरक्षण का नियम बिहार पंचायत राज अधिनियम, 2006 की धारा 15(5) के तहत चलेगा. इस मामले में बिहार आरक्षण अधिनियम, 1991, जिसमें 2003 में बदलाव हुआ था, को आधार नहीं बनाया जा सकता.

मुखिया मो. ईसा को मिली बड़ी राहत

यह फैसला सहरसा के साहुरिया पंचायत के निर्वाचित मुखिया मो. ईसा की याचिका पर आया है. न्यायमूर्ति पार्थ सारथी की एकलपीठ ने उनकी याचिका स्वीकार कर ली. कोर्ट ने जाति स्क्रूटनी कमेटी की 11 अप्रैल 2025 की रिपोर्ट और राज्य निर्वाचन आयोग के 25 जून 2025 के आदेश को रद्द कर दिया.

राज्य निर्वाचन आयोग ने मो. ईसा का मुखिया चुनाव रद्द कर दिया था. आयोग का कहना था कि उनके पूर्वज उत्तर प्रदेश से बिहार आए थे, इसलिए उन्हें EBC यानी अत्यंत पिछड़ा वर्ग के आरक्षण का लाभ नहीं मिल सकता.

125 साल पहले यूपी से आए थे पूर्वज

हाईकोर्ट ने कहा कि केवल यह तथ्य कि किसी व्यक्ति के पूर्वज करीब 125 साल पहले उत्तर प्रदेश से बिहार आए थे, उसे बिहार से बाहर का निवासी नहीं बना देता. यानी इतने लंबे समय से बिहार में रह रहे परिवार को केवल पूर्वजों के मूल राज्य के आधार पर आरक्षण से बाहर नहीं किया जा सकता.

जांच कमेटी की रिपोर्ट में भी मो. ईसा EBC

कोर्ट ने मामले की जांच से जुड़ी रिपोर्ट का भी जिक्र किया. तीन सदस्यीय जांच कमेटी ने अपनी पहली रिपोर्ट में मो. ईसा को तेली (मुस्लिम) यानी अत्यंत पिछड़ा वर्ग का सदस्य माना था.

बाद की रिपोर्ट में भी कमेटी ने उनके जाति प्रमाणपत्र को फर्जी नहीं बताया. साथ ही यह भी नहीं कहा गया कि मो. ईसा किसी दूसरी जाति से जुड़े हैं.

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राज्य निर्वाचन आयोग का आदेश क्यों हुआ रद्द

हाईकोर्ट ने कहा कि राज्य निर्वाचन आयोग ने मुखिया का चुनाव रद्द करते समय गलत कानूनी प्रावधान को आधार बनाया. इसलिए आयोग का आदेश कानूनी तौर पर सही नहीं ठहरता.

इसी वजह से कोर्ट ने मो. ईसा की याचिका मंजूर करते हुए जाति स्क्रूटनी कमेटी की रिपोर्ट और राज्य निर्वाचन आयोग के आदेश, दोनों को रद्द कर दिया. इससे मो. ईसा को बड़ी राहत मिली है.

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लेखक के बारे में

By परितोष शाही

परितोष शाही डिजिटल माध्यम में पिछले 3 सालों से पत्रकारिता में एक्टिव हैं. करियर की शुरुआत राजस्थान पत्रिका से की. अभी प्रभात खबर डिजिटल बिहार टीम में काम कर रहे हैं. देश और राज्य की राजनीति, सिनेमा और खेल (क्रिकेट) में रुचि रखते हैं.
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