बिहार पंचायत चुनाव: परिसीमन पर हाईकोर्ट में याचिका से मचा घमासान, क्या बदलेगा चुनाव का पूरा गणित?

Bihar Panchayat Election: बिहार में पंचायत चुनाव 2026 से पहले सियासत गरमा गई है. पंचायती राज व्यवस्था की नींव माने जाने वाले परिसीमन को लेकर अब मामला अदालत में पहुंच गया है. पटना हाईकोर्ट में दायर एक अहम याचिका ने राज्य सरकार की नीतियों पर सवाल खड़े कर दिए हैं . अब निगाहें अदालत के फैसले पर टिक गई हैं, जो चुनावी समीकरण पूरी तरह बदल सकता है.

Bihar Panchayat Election: बिहार की ग्रामीण राजनीति में इस वक्त जबरदस्त उबाल है. 2026 के पंचायत चुनाव से ठीक पहले पटना हाई कोर्ट में दायर एक याचिका ने नीतीश सरकार की नींद उड़ा दी है.

दावा किया जा रहा है कि बिहार में पंचायतों का ढांचा 30 साल पुराना है, जिसे बदले बिना चुनाव कराना लोकतंत्र के साथ खिलवाड़ होगा.

30 साल पुरानी फाइलों पर टिका है बिहार का भविष्य

बिहार में पंचायतों की जो सीमाएं वे साल 1991 की जनगणना के आधार पर 1994 में तय की गई थीं. याचिकाकर्ताओं का सबसे बड़ा तर्क यही है कि तीन दशकों में बिहार की आबादी और भूगोल पूरी तरह बदल चुका है, लेकिन चुनाव आज भी उसी ‘आउटडेटेड’ नक्शे पर कराए जा रहे हैं.

मुखिया संघ के प्रदेश अध्यक्ष मिथिलेश कुमार और अन्य दिग्गज जनप्रतिनिधियों ने अदालत में गुहार लगाई है कि जब तक नया परिसीमन नहीं होता, तब तक चुनाव की प्रक्रिया को सही नहीं माना जा सकता. यह मामला अब बिहार की जमीनी सियासत का सबसे बड़ा मुद्दा बन गया है.

नए शहरों के बनने से बिगड़ा पंचायतों का गणित

पिछले कुछ वर्षों में बिहार सरकार ने विकास के नाम पर 261 नए शहरी निकाय (नगर निगम, परिषद और पंचायत) बनाए हैं. इस शहरीकरण की वजह से कई पुरानी पंचायतों का अस्तित्व आधा शहर और आधा गांव में बंट गया है.

याचिका में आरोप लगाया गया है कि सरकार ने नए शहर तो बना दिए, लेकिन उनसे प्रभावित होने वाली ग्रामीण सीमाओं को जस का तस छोड़ दिया. इससे न केवल वार्डों का समीकरण बिगड़ गया है, बल्कि आरक्षण की व्यवस्था पर भी सवालिया निशान खड़े हो गए हैं. अगर हाई कोर्ट इस दलील को स्वीकार करता है, तो 2026 के चुनाव से पहले पूरे बिहार का चुनावी नक्शा फिर से खींचना पड़ सकता है.

क्या टल जाएंगे 2026 के पंचायत चुनाव?

क्या इस कानूनी पचड़े की वजह से चुनाव की तारीखें आगे बढ़ सकती हैं. वर्तमान में राज्य निर्वाचन आयोग नवंबर-दिसंबर 2026 में चुनाव कराने की तैयारी कर रहा है, लेकिन परिसीमन जैसी जटिल प्रक्रिया में महीनों का समय लगता है.

अगर नई जनगणना और भौगोलिक बदलावों को आधार बनाया गया, तो बिहार की राजनीति में एक बड़ा ‘पावर शिफ्ट’ देखने को मिल सकता है, जिससे पुराने दिग्गजों की सीटें भी खतरे में पड़ सकती हैं.

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लेखक के बारे में

By Pratyush Prashant

महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में एम.ए. तथा जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) से मीडिया और जेंडर में एमफिल-पीएचडी के दौरान जेंडर संवेदनशीलता पर निरंतर लेखन. जेंडर विषयक लेखन के लिए लगातार तीन वर्षों तक लाडली मीडिया अवार्ड से सम्मानित रहे. The Credible History वेबसाइट और यूट्यूब चैनल के लिए कंटेंट राइटर और रिसर्चर के रूप में तीन वर्षों का अनुभव. वर्तमान में प्रभात खबर डिजिटल, बिहार में राजनीति और समसामयिक मुद्दों पर लेखन कर रहे हैं. किताबें पढ़ने, वायलिन बजाने और कला-साहित्य में गहरी रुचि रखते हैं तथा बिहार को सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक दृष्टि से समझने में विशेष दिलचस्पी.

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