Bihar Panchayat Chunav: बिहार में अगले साल होने वाले पंचायत चुनाव की तैयारी जारी है. इस बीच चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों से जुड़ी जरूरी खबर है. पटना हाईकोर्ट ने बेहद खास फैसला सुनाया है. कोर्ट ने साफ कर दिया है कि सरकारी नौकरी में मिलने वाला आरक्षण और पंचायत चुनाव का आरक्षण एक ही नियम से तय नहीं होगा. खासकर मुखिया के चुनाव में आरक्षण तय करने के लिए 1991 के बिहार आरक्षण कानून को सीधे लागू नहीं किया जा सकता.
इस मामले में सुनवाई पर लिया गया फैसला
यह फैसला सहरसा जिले की ग्राम पंचायत राज सहुरिया के मुखिया मो. ईसा की याचिका पर आया है. न्यायमूर्ति पार्थ सारथी की एकलपीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि मुखिया के चुनाव में आरक्षण का आधार बिहार पंचायत राज अधिनियम, 2006 की धारा 15(5) होगी.
आखिर विवाद क्या था?
मो. ईसा को मुखिया पद से हटाने के मामले में जाति छानबीन समिति की रिपोर्ट सामने आई थी. इसी रिपोर्ट के आधार पर राज्य निर्वाचन आयोग ने उन्हें पद से हटाने का आदेश दिया था. मो. ईसा ने इस कार्रवाई को हाईकोर्ट में चुनौती दी. सुनवाई के बाद कोर्ट ने न केवल निर्वाचन आयोग के आदेश को रद्द कर दिया, बल्कि जाति छानबीन समिति की रिपोर्ट को भी निरस्त कर दिया. कोर्ट का यह फैसला 31 पन्नों का है.
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1991 के आरक्षण कानून की भूमिका क्या है?
पटना हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि बिहार का 1991 वाला आरक्षण कानून मुख्य रूप से राज्य सरकार की नौकरियों और सेवाओं में आरक्षण से जुड़ा है. इसलिए पंचायत चुनाव में सीटों का आरक्षण तय करने के लिए इसे सीधे लागू नहीं किया जा सकता.
लेकिन, इस कानून का इस्तेमाल यह निर्धारित करने में किया जा सकता है कि कौन-कौन सी जातियां पिछड़ा वर्ग की श्रेणी में आती हैं. लेकिन पंचायत चुनाव में किस सीट पर किस वर्ग के लिए आरक्षण होगा, इसके लिए अलग कानूनी प्रावधान लागू होंगे.
अब क्या बदलेगा?
कोर्ट के इस फैसले से पंचायत चुनाव में आरक्षण को लेकर चल रहे कई विवादों की तस्वीर साफ हो सकती है. मुखिया की सीट के आरक्षण से जुड़े मामलों में अब बिहार पंचायत राज अधिनियम की धारा 15(5) को प्रमुख आधार माना जाएगा. इस तरह से हाईकोर्ट ने साफ कर दिया है कि नौकरी का आरक्षण अलग, चुनाव का आरक्षण अलग और दोनों के नियम भी अलग हैं.
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