भागलपुर और नवगछिया को जोड़ने वाले विक्रमशिला सेतु पर 28 अगस्त 2026 की आधी रात से आवागमन पूरी तरह बंद होने जा रहा है. पुल के बंद होने से पूर्वी बिहार के लोगों को एक बार फिर 1980 के दशक जैसी भारी मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है. सड़क मार्ग बंद होने के बाद 29 अगस्त से लोगों को मुख्य रूप से गंगा नदी के जलमार्ग (नाव और स्टीमर) पर निर्भर रहना पड़ेगा. प्रशासन ने वैकल्पिक व्यवस्था तो की है, लेकिन बाढ़ और उफनती नदी के बीच यह सफर काफी जोखिम भरा साबित हो सकता है.
जलमार्ग पर निर्भरता और प्रशासन की तैयारी
पुल बंद होने के बाद 29 अगस्त से लोग महादेवपुर-बरारी घाट के बीच नाव और स्टीमर से सफर करेंगे.
प्रशासन ने यात्रियों की सुविधा के लिए चार बड़े जहाजों को तैयार किया है और बड़ी नावों की फिटनेस भी जांची जा रही है. तिनटंगा करारी-कहलगांव गंगा घाट पर फिलहाल दो फेरी सेवा चल रही हैं. हालांकि, बरसात के मौसम में नदी का जलस्तर खतरे के निशान से ऊपर जाने पर, सुरक्षा कारणों से नावों का परिचालन रोका भी जा सकता है. पहले भी बाढ़ के दौरान फेरी सेवा बंद की जाती रही है.
मायागंज अस्पताल पहुंचने में मरीजों को होगी भारी परेशानी
इस बंदी का सबसे गंभीर असर बीमार मरीजों और उनके परिजनों पर पड़ेगा.
नवगछिया, कोसी, सीमांचल और पूर्वी बिहार से बड़ी संख्या में मरीज बेहतर इलाज के लिए भागलपुर के जेएलएनएमसीएच (मायागंज अस्पताल) आते हैं. पुल बंद होने पर मरीजों को पहले घाट जाना होगा, फिर नाव से नदी पार करनी होगी और उसके बाद अस्पताल पहुंचना होगा. किसी भी आपातकालीन स्थिति (इमरजेंसी) में सफर का यह अतिरिक्त समय मरीजों की जान पर भारी पड़ सकता है.
दैनिक यात्री और लंबे रूट की गाड़ियों पर पड़ेगा सीधा असर
नवगछिया से भागलपुर रोज आने-जाने वाले मजदूरों, छात्रों, नौकरीपेशा लोगों और व्यापारियों की मुश्किलें भी काफी बढ़ जाएंगी.
- खर्च और समय: सड़क के बजाय पानी के रास्ते जाने से यात्रा में लगने वाला समय और किराया दोनों ज्यादा लगेगा. मौसम खराब होने पर जान का जोखिम अलग से रहेगा.
- मुंगेर पुल पर बढ़ेगा जाम: लंबी दूरी के बड़े वाहनों को अब मुंगेर के रास्ते गंगा पार करनी होगी. इससे मुंगेर पुल और वहां की सड़कों पर वाहनों का भारी दबाव बढ़ेगा और जाम की स्थिति पैदा हो सकती है.
विक्रमशिला सेतु सिर्फ एक पुल नहीं, बल्कि नवगछिया और भागलपुर सहित कई जिलों की 'जीवनरेखा' है. ऐसे में प्रशासन के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह गंगा के उफान के बीच जलमार्ग को सुरक्षित और नियमित रूप से कैसे चलाए, ताकि लोगों को मजबूरी में जोखिम उठाकर यात्रा न करनी पड़े.
