भागलपुर से दीपक राव की रिपोर्ट
भागलपुर. दिनों-दिन बढ़ते पॉलीथिन के प्रयोग ने शहरवासियों को इस कदर मुश्किल में डाल दिया है, इसका अंदाजा शायद उन्हें नहीं है. हर रोज गली-मोहल्लों में प्लास्टिक जलाया जाता है. इन्हें नालियों व सड़कों पर भी फेंक दिया जाता है. थोड़ी सी सुविधा के मोह में लोगों ने अपने स्वास्थ्य को खतरे में डाल दिया है. बाजार में आज भी 20 माइक्रोन से कम की पॉलीथिन धड़ल्ले से उपयोग में लाई जा रही है, चाहे थैले के रूप में हो या खाद्य पदार्थ पैक करने में. यह सब चोरी-छुपे नहीं बल्कि प्रशासनिक अधिकारियों के सामने खुलेआम हो रहा है. इतना ही नहीं, इस तरह की पॉलीथिन व थैलों का निर्माण भी शहर के दक्षिणी क्षेत्र, नाथनगर आदि स्थानों पर हो रहा है.सरकारी निर्देश के बाद घटा पॉलीथिन का उपयोग
पहले जहां शहर में रोजाना 500 किलो पॉलीथिन की सप्लाई होती थी, वहीं अब यह घटकर आधी रह गई है. इस्टर्न बिहार इंडस्ट्रीज एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष सीए प्रदीप झुनझुनवाला ने बताया कि पहले औसतन 500 किलो प्लास्टिक की सप्लाई व उपयोग होता था. हाल के दिनों में लोग पॉलीथिन के उपयोग से कतराने लगे हैं. कचरे से तैयार काले रंग की पॉलीथिन का उपयोग सबसे अधिक हानिकारक है. यह पॉलीथिन पटना के मछरट्टा और कोलकाता में तैयार होती है. यह शरीर पर गंभीर नुकसान पहुंचाती है और नष्ट न होने के कारण मिट्टी की उर्वरा शक्ति को भी खत्म कर देती है.पॉलीथिन से होने वाले नुकसान
शहर का ड्रेनेज सिस्टम खराब हो रहा है.गीले खाद्य पदार्थ को प्रदूषित कर देती है.
मवेशियों के खाने से स्वास्थ्य पर असर पड़ता है.खेत की उर्वरा शक्ति नष्ट होती है.
सभी जीवों के लिए खतरनाक साबित हो रही है.प्लास्टिक से जुड़े गंभीर खतरे
एक पॉलीथिन का उपयोग केवल पांच मिनट के लिए होता है, लेकिन इसे नष्ट होने में 1000 वर्ष से अधिक लगते हैं. समुद्र के प्रति वर्ग मील में लगभग 46 हजार पॉलीथिन टुकड़े पाए जाते हैं, जो हजारों जलीय जीवों की मौत का कारण बनते हैंप्लास्टिक बोतल से भी खतरा
पॉलीथिन बैग ही नहीं, प्लास्टिक उत्पाद भी बड़ा नुकसान पहुंचा रहे हैं. लोग अक्सर गाड़ी में सफर के दौरान प्लास्टिक बोतल का पानी लंबे समय तक पीते हैं, जो हानिकारक है. गरम वातावरण में प्लास्टिक बोतल से डाइऑक्सिन निकलता है, जो कैंसर का खतरा बढ़ाता है. इसी तरह पानी भरी बोतल को लंबे समय तक फ्रिज में रखने से भी डाइऑक्सिन बनने की आशंका रहती है.
