भागलपुर जिले के खरीक प्रखंड अंतर्गत राघोपुर-काजीकोरैया जमींदारी तटबंध वर्षों से गंगा के भीषण कटाव का दंश झेल रहा है. तटबंध को सुरक्षित रखने के लिए पिछले दो दशकों में करोड़ों रुपये की योजनाएं बनीं और फ्लड फाइटिंग के नाम पर पानी की तरह पैसा बहाया गया. इसके बावजूद, हर साल बरसात आते ही गंगा की लहरें इन सभी दावों और कटावरोधी कार्यों को बहा ले जाती हैं. जुलाई 2026 में तटबंध का एक बड़ा हिस्सा नदी में समा जाने के बाद, ग्रामीणों ने जल संसाधन विभाग की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े करते हुए अब तक खर्च हुई राशि की उच्चस्तरीय तकनीकी जांच (ऑडिट) की मांग की है.
2005 से चल रहा 'उपचार' का खेल, हर साल गहराता है संकट
राघोपुर-काजीकोरैया तटबंध की कहानी केवल प्राकृतिक आपदा की नहीं, बल्कि बार-बार होने वाले खर्च और लौटते खतरे की कहानी है:
- शुरुआती योजना: प्राप्त जानकारी के अनुसार, वर्ष 2005-06 में काजीकोरैया से राघोपुर तक करीब 13 करोड़ रुपये की लागत से स्थायी कटावरोधी कार्य शुरू कराया गया था.
- करोड़ों का बजट: एक पुराने आकलन के अनुसार, 2006 से 2019 के बीच पूरे नवगछिया अनुमंडल में स्थायी कटावरोधी और फ्लड फाइटिंग कार्यों पर करीब 686 करोड़ रुपये खर्च किए गए हैं.
- खतरे का इतिहास: राघोपुर-काजीकोरैया तटबंध पर सितंबर 2023 और फिर 2024 में भीषण कटाव हुआ था, जिसमें तटबंध का आधे से अधिक हिस्सा कट गया था. सितंबर 2025 में भी अलालपुर के जाह्नवी चौक-महादेवपुर गंगा घाट के समीप 50 मीटर दायरे में कटाव हुआ, जिसे बालू की बोरियां डालकर रोका गया.
जुलाई 2026 में खुली सुरक्षा व्यवस्था की पोल
कटाव के मंडराते खतरे को देखते हुए जनवरी 2026 में जल संसाधन विभाग ने काजीकोरैया-राघोपुर में करीब 5 करोड़ रुपये की प्राक्कलित राशि से नई कटावरोधी योजना तैयार की थी.
हालांकि, इसी साल जुलाई में गंगा ने इन कागजी तैयारियों की पोल खोल दी. राघोपुर के समीप रातों-रात करीब 110 से 150 मीटर तटबंध का हिस्सा बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया और जल संसाधन विभाग का अस्थायी कैंप कार्यालय भी नदी में समा गया. इसके बाद प्रशासन को आनन-फानन में युद्धस्तर पर बचाव कार्य करना पड़ा.
ग्रामीणों का सवाल: आखिर स्थायी समाधान क्यों नहीं?
"राशि आती रही, काम होता रहा, लेकिन गंगा का कटाव नहीं रुका।" इसी बात को लेकर अब स्थानीय ग्रामीणों और प्रबुद्धजनों में भारी आक्रोश है:
- खर्च का सार्वजनिक ब्योरा: ग्रामीणों ने मांग की है कि पिछले दो दशक में इस तटबंध पर स्वीकृत और खर्च हुई राशि का वर्षवार ब्यौरा सार्वजनिक किया जाए.
- तकनीकी जांच की मांग: किस एजेंसी ने कितना काम किया, कितनी राशि खर्च हुई और कार्य कितने समय तक टिक पाया, इसकी निष्पक्ष तकनीकी जांच होनी चाहिए.
- वैज्ञानिक अध्ययन की जरूरत: स्थानीय लोगों का कहना है कि हर साल बाढ़ आने पर बोरियां डालने के बजाय गंगा की धारा का वैज्ञानिक अध्ययन कर संवेदनशील स्थलों का कोई ठोस और स्थायी समाधान निकाला जाए.
आंकड़ों में राघोपुर-काजीकोरैया तटबंध का हाल:
- 2005-06: करीब ₹13 करोड़ (काजीकोरैया से राघोपुर तक स्थायी कटावरोधी कार्य).
- 2006-2019: करीब ₹686 करोड़ (पूरे नवगछिया अनुमंडल में स्थायी कटावरोधी व फ्लड फाइटिंग कार्य).
- जनवरी 2026: करीब ₹5 करोड़ (काजीकोरैया-राघोपुर के लिए नई कटावरोधी योजना).
- जुलाई 2026: राघोपुर के समीप 110-150 मीटर तटबंध क्षतिग्रस्त, कैंप कार्यालय बहा.
अब यह देखना अहम होगा कि सरकार और जल संसाधन विभाग ग्रामीणों की इस जायज मांग पर क्या संज्ञान लेते हैं और क्या इस बार कोई स्थायी समाधान निकल पाता है.
