सनातन संस्कृति में अपने कुल के पूर्वजों के प्रति अगाध श्रद्धा, कृतज्ञता और आत्मिक जुड़ाव का 16 दिवसीय महापर्व 'पितृ पक्ष' आगामी शनिवार, 26 सितंबर से विधिवत प्रारंभ हो रहा है.
आगामी 10 अक्टूबर तक चलने वाले इस 16 दिवसीय पितृ पक्ष के दौरान घर-घर में दिवंगतों की पुण्य स्मृतियों को नमन किया जाएगा. परिवारजन अपने पूर्वजों की देहावसान तिथि के अनुसार श्राद्ध कर्म, तर्पण और पिंडदान की युगों पुरानी परंपरा का निर्वहन करेंगे. गंगा और कोसी नदी के विस्तृत कछारी व तटवर्ती क्षेत्रों में पितृ पक्ष को लेकर विशेष आध्यात्मिक और धार्मिक वातावरण निर्मित होने लगा है.
तिथि अनुसार होगा श्राद्ध, सर्वपितृ अमावस्या पर ज्ञात-अज्ञात को मोक्ष
शास्त्र सम्मत विधान के अनुसार, परिवार के जिस सदस्य का निधन जिस विशिष्ट तिथि को हुआ था, पितृ पक्ष में उसी तिथि को उनका विधिवत श्राद्ध संपन्न कराया जाता है.
जिन पूर्वजों के महाप्रयाण की निश्चित तिथि विस्मृत हो चुकी है या ज्ञात नहीं है, उनके निमित्त 10 अक्टूबर को 'सर्वपितृ अमावस्या' के दिन सामूहिक तर्पण और पिंडदान की प्राचीन व्यवस्था है. इस दिन परिवार के सभी ज्ञात-अज्ञात पितरों का स्मरण कर उन्हें जल अर्पण किया जाता है. श्राद्ध कर्म में गंगाजल, काले तिल, कुशा (दर्भ), जौ और श्वेत पुष्पों का विशेष महात्म्य माना गया है, जिसे पुरोहितों की देखरेख में वेदमंत्रों के साथ अर्पित किया जाता है.
गंगा-कोसी के घाटों पर उमड़ेगी भीड़, बाजार में बढ़ी रौनक
गोपालपुर, इस्माईलपुर, रंगरा और कहलगांव समेत गंगा व कोसी नदी के सभी प्रमुख घाटों पर शनिवार की अहले सुबह से ही तर्पण करने वाले श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ेगी.
पवित्र नदियों में ब्रह्म मुहूर्त स्नान के उपरांत श्रद्धालु सूर्य को अर्घ्य देकर अंजलि से पितरों को तृप्त करेंगे. वहीं दूर-दराज के ग्रामीण इलाकों में लोग अपने घरों और दालानों में भी कुल पुरोहितों को आमंत्रित कर शांति पाठ और श्राद्ध करा रहे हैं. पर्व को लेकर स्थानीय हाट-बाजारों में काले तिल, कुशा की अंगूठी, मिट्टी के पात्र, रोली, जनेऊ और फलों की दुकानों पर खरीदारी तेज हो गई है.
संयम, दान और पंचबलि की महिमा: कौवे व गाय को ग्रास
पितृ पक्ष को केवल पारंपरिक अनुष्ठान तक सीमित न रखकर पारिवारिक संस्कारों और त्याग की परंपरा से जोड़कर देखा जाता है.
इन 16 दिनों के दौरान परिवारों में पूर्ण सात्विक दिनचर्या का पालन किया जाता है तथा किसी भी प्रकार के मांगलिक और वैवाहिक आयोजनों पर रोक रहती है. श्राद्ध कर्म के बाद पंचबलि विधान के तहत पहली रोटी गाय को, चींटियों को, श्वेत श्वान को और कौवे को ग्रास निकालने की अटल परंपरा है, क्योंकि गरुड़ पुराण में कौवे को यम और पितरों का संदेशवाहक माना गया है. इसके उपरांत ब्राह्मणों, संन्यासियों और जरूरतमंदों को श्रद्धापूर्वक भोजन कराकर वस्त्र व अन्न दान दिया जाता है.
मातृ नवमी का विशेष महात्म्य, जड़ों से जुड़ने की अनूठी सीख
पितृ पक्ष के दौरान पड़ने वाली 'मातृ नवमी' तिथि को माताओं और कुलवधुओं के श्राद्ध के लिए अत्यंत पावन माना जाता है.
बुजुर्गों और आचार्यों का मानना है कि भागदौड़ भरी आधुनिक जीवनशैली के बीच पितृ पक्ष नई पीढ़ी को अपने पुरखों के त्याग, संघर्ष और संस्कारों से रूबरू कराने का स्वर्णिम अवसर है. नदी तटों पर शांत चित्त बैठकर पूर्वजों का नाम और गोत्र उच्चारित करते हुए जल अर्पण करने का दृश्य हर किसी को अपनी जड़ों, परिवार और सनातन मूल्यों के प्रति भावनात्मक रूप से जोड़ देता है.
