मन्नत पूरी हो तो चढ़ाते हैं बांसुरी! एक जमींदार की इच्छा से शुरू हुई पूजा, आज गोसाईंगांव की पहचान है श्रीकृष्ण मंदिर

गोपालपुर के गोसाईंगांव में सदियों पुरानी श्रीकृष्ण पूजा की जड़ें एक जमींदार की मनोकामना से जुड़ी हैं. यह परंपरा अब पूरे गांव की पहचान बन चुकी है, जहाँ मन्नत पूरी होने पर श्रद्धालु भगवान को बांसुरी चढ़ाते हैं. यह उत्सव सामाजिक एकजुटता और गहरी आस्था का प्रतीक है.

गोपालपुर : गोपालपुर थाना क्षेत्र के गोसाईंगांव में भगवान श्रीकृष्ण की पूजा की शुरुआत कभी एक छोटी-सी प्रतिमा और एक जमींदार की मनोकामना से हुई थी. आज वही परंपरा पूरे गांव की पहचान बन चुकी है. करीब एक सदी से अधिक पुरानी इस धार्मिक परंपरा के पीछे मनोकामना, जमीन दान और सामूहिक आस्था की कहानी जुड़ी है, जिसे गांव की पीढ़ियां आज भी याद करती हैं.

जमींदार की मनोकामना पूरी हुई तो पुरोहित को मिली जमीन

गांव के बुजुर्गों के अनुसार, जगतपुर के एक जमींदार की मनोकामना पूरी होने के बाद उन्होंने अपने पुरोहित और गोसाईंगांव निवासी को कुछ जमीन दान में दी थी. इस जमीन से होने वाली आय का इस्तेमाल भगवान श्रीकृष्ण की पूजा और जन्माष्टमी के आयोजन में किया जाने लगा.

उस समय न कोई भव्य मंदिर था और न बड़े आयोजन की व्यवस्था. पुरोहित अपने दरवाजे पर भगवान श्रीकृष्ण की प्रतिमा स्थापित कर जन्माष्टमी के दिन विधि-विधान से पूजा करते थे. धीरे-धीरे आसपास के लोग भी इस पूजा में शामिल होने लगे. एक घर से शुरू हुई आस्था देखते ही देखते पूरे गांव की श्रद्धा बन गयी.

चंदे से बना मंदिर, सामूहिक हुआ जन्माष्टमी उत्सव

समय के साथ जन्माष्टमी का आयोजन पुरोहित परिवार तक सीमित नहीं रहा. ग्रामीणों की भागीदारी बढ़ती गयी और लोगों ने अपनी सामर्थ्य के अनुसार चंदा देना शुरू किया. सामूहिक प्रयास से मंदिर का निर्माण हुआ और जन्माष्टमी का आयोजन भी बड़े स्तर पर होने लगा.

आज जन्माष्टमी के अवसर पर गोसाईंगांव का श्रीकृष्ण मंदिर रोशनी, फूलों और झांकियों से सजाया जाता है. गांव के अलावा आसपास के क्षेत्रों से भी श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं. मध्यरात्रि में भगवान श्रीकृष्ण के जन्म के समय विशेष पूजा, अभिषेक और महाआरती की परंपरा है. इस वर्ष भी 4 सितंबर की मध्यरात्रि को जन्मोत्सव मनाया जाएगा.

मन्नत पूरी होने पर भगवान को चढ़ाते हैं बांसुरी

गोसाईंगांव के इस मंदिर की सबसे खास पहचान यहां की बांसुरी अर्पित करने की परंपरा है. स्थानीय मान्यता है कि सच्चे मन से मांगी गयी मनोकामना पूरी होने पर श्रद्धालु भगवान श्रीकृष्ण के चरणों में बांसुरी चढ़ाते हैं.

कोई लकड़ी की बांसुरी अर्पित करता है तो कोई चांदी की. वर्षों से चली आ रही यह परंपरा आज भी श्रद्धालुओं के बीच गहरी आस्था का विषय है.

सिर्फ मंदिर नहीं, गांव की सांस्कृतिक पहचान

गोसाईंगांव का श्रीकृष्ण मंदिर अब केवल पूजा का स्थल नहीं रह गया है. जन्माष्टमी यहां सामाजिक एकजुटता और सामूहिक आस्था का पर्व बन चुकी है. आयोजन में गांव के अलग-अलग परिवार और वर्ग अपनी भूमिका निभाते हैं.

युवा सजावट और व्यवस्था संभालते हैं, जबकि बुजुर्ग परंपराओं को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने में जुटे रहते हैं. पीढ़ियां बदलीं, गांव का स्वरूप बदला और उत्सव मनाने का तरीका भी बदला, लेकिन पुरानी आस्था की डोर आज भी कायम है.

दरवाजे की प्रतिमा से मंदिर तक का सफर

गोसाईंगांव की जन्माष्टमी की कहानी इसलिए भी खास है क्योंकि इसकी शुरुआत किसी बड़े मंदिर या बड़े आयोजन से नहीं हुई थी. एक जमींदार की मनोकामना पूरी हुई, पुरोहित को जमीन मिली, जमीन की आय से पूजा चलने लगी और फिर वही पूजा धीरे-धीरे पूरे गांव की सामूहिक आस्था बन गयी.

जन्माष्टमी की रात जब मंदिर में कान्हा के जन्म का शंखनाद होता है और ‘नंद के घर आनंद भयो, जय कन्हैया लाल की’ के जयघोष से परिसर गूंज उठता है, तब इस उत्सव में उस पुरानी परंपरा की छाप भी साफ नजर आती है.

गोसाईंगांव के लिए यह सिर्फ जन्माष्टमी का उत्सव नहीं, बल्कि उस विरासत का उत्सव है, जिसकी शुरुआत एक छोटी-सी पूजा से हुई और जो आज पूरे गांव की पहचान बन चुकी है.

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By Vipin Thakur

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