जब भाई कराते हैं बहनों को नदी पार, गमछे में मिलता है ठेकुआ, जानिए करमा-धरमा पर्व की अनोखी परंपरा

करमा-धरमा पर्व, भाई-बहन के अटूट स्नेह और पारिवारिक मंगल की कामना का उत्सव है. यह पर्व लोकगीतों, आस्था और पारंपरिक रस्मों से ग्रामीण समाज में आज भी अपनी पहचान बनाए हुए है.

गोपालपुर : गांव की पगडंडियों पर गूंजते सामूहिक लोकगीत, हाथों में सुपारी और सिक्का लेकर झूर को निमंत्रण देने जातीं गांव की बेटियां... करमा-धरमा पर्व की यह परंपरा आज भी ग्रामीण समाज में अपनी पुरानी पहचान के साथ जीवंत है. यह पर्व केवल पूजा-अर्चना का अवसर नहीं, बल्कि भाई-बहन के स्नेह, विश्वास, त्याग और पारिवारिक मंगल की कामना से जुड़ी लोकपरंपरा है.

लोकगीत गाते हुए झूर को दिया जाता है निमंत्रण

करमा-धरमा को लेकर गांव की लड़कियां समूह बनाकर झूर को निमंत्रण देने जाती हैं. लोकगीत गाते हुए वे झूर के पास पहुंचती हैं और उसे सुपारी व सिक्का देकर विधिवत निमंत्रण देती हैं. लोकमान्यता के अनुसार, पर्व में पूजे जाने वाले करम देवता को सम्मानपूर्वक घर बुलाने की यह परंपरा है.

निमंत्रण देने के अगले दिन लड़कियां नियम-निष्ठा और श्रद्धा के साथ झूर को उखाड़कर घर लाती हैं. इसके बाद पर्व की अगली रस्में शुरू होती हैं.

आंगन में बनाया जाता है प्रतीकात्मक तालाब

संध्या के समय घर के आंगन में जमीन खोदकर तालाब की आकृति बनायी जाती है. इसी स्थान पर झूर को स्थापित किया जाता है. इसके बाद गांव की लड़कियां और महिलाएं एकत्र होकर करमा-धरमा की पूजा करती हैं. पूजा के दौरान पारंपरिक लोकगीत गाये जाते हैं और रीति-रिवाज के अनुसार रस्में पूरी की जाती हैं.

इस पूजा की खास बात यह है कि इसमें किसी पुरोहित की आवश्यकता नहीं होती. गांव की महिलाएं और युवतियां स्वयं पारंपरिक विधि से पूजा संपन्न करती हैं. पर्व के दिन लड़कियां दिनभर उपवास रखती हैं और शाम को पूजा के बाद प्रसाद ग्रहण करती हैं.

कथा वाचिका सुनाती हैं करमा-धरमा की लोककथा

पूजा के दौरान कथा वाचिका करमा-धरमा की लोककथा सुनाती हैं. कथा में भाई-बहन के रिश्ते, आपसी प्रेम, त्याग और परिवार की सुख-समृद्धि का संदेश निहित है. कथा सुनने के लिए आसपास की महिलाएं और युवतियां भी एकत्र होती हैं.

लोकगीतों और कथा के बीच पूरा वातावरण भक्तिमय होने के साथ ग्रामीण संस्कृति के रंग में रंग जाता है. करमा-धरमा की लोकमान्यता में कर्म और धर्म को जीवन का आधार माना गया है. कथा के अलग-अलग प्रसंगों के माध्यम से परिवार में प्रेम, विश्वास और सदाचार बनाए रखने का संदेश दिया जाता है.

भाई कराते हैं बहनों को नदी पार, गमछे में मिलता है ठेकुआ

पूजा के बाद पर्व की सबसे आत्मीय रस्मों में भाई द्वारा बहन को नदी पार कराना शामिल है. भाई अपनी बहनों को नदी पार कराते हैं. इस रस्म को बहन की रक्षा और उसके जीवन में सुख-समृद्धि की कामना से जोड़कर देखा जाता है.

नदी पार कराने के बाद बहनें अपने भाइयों को गमछे में ठेकुआ का प्रसाद देती हैं. भाई-बहन के बीच होने वाली यह रस्म पर्व को भावनात्मक रूप से खास बना देती है.

इस दौरान गांव की महिलाएं और युवतियां पारंपरिक गीत गाती हैं. कहीं ढोल-मांदर की थाप सुनायी देती है तो कहीं समूह में गाये जा रहे लोकगीत पूरे माहौल को उत्सवी बना देते हैं.

नई पीढ़ी तक पहुंच रही लोकपरंपरा

आधुनिकता के दौर में ग्रामीण जीवन की कई पुरानी परंपराएं बदल रही हैं, लेकिन करमा-धरमा पर्व आज भी गांवों में सामूहिक रूप से मनाया जाता है. झूर को निमंत्रण देने से लेकर उसे घर लाने, आंगन में स्थापित करने, उपवास रखने, कथा सुनने और पूजा करने तक हर रस्म में गांव की बेटियों और महिलाओं की प्रमुख भूमिका रहती है.

करमा-धरमा की यही लोकपरंपरा भाई-बहन के रिश्ते को मजबूत करने के साथ नई पीढ़ी को अपनी जड़ों और ग्रामीण संस्कृति से जोड़ती है. लोकगीतों में आज भी वही पुरानी मिठास सुनायी देती है और झूर की पूजा के साथ गांव के आंगन में लोक आस्था और परंपरा फिर जीवंत हो उठती है.

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By Vipin Thakur

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