फीस के बोझ तले दबा बचपन. नौ साल का दिव्यांशु पढ़ाई के लिए दर-दर भटका

मंगलवार की सुबह अनुमंडल कार्यालय कहलगांव में एक ऐसा चेहरा पहुंचा, जिसने वहां मौजूद हर शख्स को कुछ पल के लिए ठहरने पर मजबूर कर दिया.

मंगलवार की सुबह अनुमंडल कार्यालय कहलगांव में एक ऐसा चेहरा पहुंचा, जिसने वहां मौजूद हर शख्स को कुछ पल के लिए ठहरने पर मजबूर कर दिया. यह कोई आम फरियादी नहीं था, बल्कि महज नौ साल का दिव्यांशु कुमार था. हाथ में आवेदन, आंखों में उम्मीद और दिल में एक ही ख्वाहिश… “मुझे फिर से स्कूल जाना है.”

प्रखंड के कलगीगंज के पंकज मंडल (अब स्वर्गीय) के पुत्र दिव्यांशु की कहानी किसी भी संवेदनशील इंसान को भीतर तक झकझोर देती है. वर्ष 2023 में एक हादसे ने उसके सिर से पिता का साया छीन लिया. परिवार पहले ही टूट चुका था, लेकिन हालात यहीं नहीं रुके. कुछ समय बाद मां भी उसे छोड़कर दूसरी जिंदगी की तलाश में चली गयी. मां ने दूसरी शादी कर ली. बचा एक मासूम, जिसकी दुनिया अब उसके बुजुर्ग दादा के इर्द-गिर्द सिमट गयी. कभी डीएवी पब्लिक स्कूल, एनटीपीसी कहलगांव में पढ़ने वाला दिव्यांशु हालात के थपेड़ों में ऐसा उलझा कि स्कूल छूट गया. वक्त बीतता गया और किताबें उससे दूर होती चली गयी. लेकिन जब दादा ने हिम्मत जुटाई और उसे फिर से सरकारी स्कूल में दाखिला दिलाने की कोशिश की, तो सिस्टम ने एक और दीवार खड़ी कर दी-“पहले पुराने स्कूल से ट्रांसफर सर्टिफिकेट (टीसी) लाओ.”उम्मीद के साथ जब परिवार पुराने स्कूल पहुंचा, तो वहां से एक और झटका मिला. बताया गया कि करीब 26 हजार रुपये की फीस बकाया है, और जब तक यह राशि जमा नहीं होगी, टीसी जारी नहीं किया जाएगा. 26 हजार रुपये…यह आंकड़ा किसी बड़े शहर के लिए भले छोटा लगे, लेकिन एक ऐसे परिवार के लिए, जहां रोजमर्रा की जरूरतें ही किसी जंग से कम नहीं, यह एक असंभव सी दीवार है. इसी मजबूरी ने दिव्यांशु को अपने छोटे-छोटे कदमों से सिस्टम के बड़े दरवाजे तक पहुंचा दिया. वह खुद एसडीएम से मिलने आया, ताकि कोई उसकी बात सुन ले, कोई उसकी फीस माफ कर दे, और उसकी छूटी हुई पढ़ाई फिर से शुरू हो सके. हालांकि, एसडीओ सर से उसकी मुलाकात नहीं हो सकी, लेकिन उसने हार नहीं मानी है. कार्यालय में अपना आवेदन जमा कर दिया है. यह पूरा घटनाक्रम कई सवाल खड़े करता है. एक ओर सरकार हर बच्चे को शिक्षा से जोड़ने की बात करती है, वहीं दूसरी ओर एक मासूम सिर्फ एक कागज टीसी और कुछ हजार रुपये के अभाव में स्कूल से दूर है.

आंखों में एक ही सवाल- क्या मैं फिर से स्कूल जा पाऊंगा?

क्या एक बच्चे का भविष्य 26 हजार रुपये से छोटा है? क्या नियम इतने कठोर हो सकते हैं कि वे एक मासूम की पढ़ाई ही छीन लें? इस मामले में जब स्कूल प्रबंधन से संपर्क करने की कोशिश की गयी, तो उन्होंने फिलहाल जानकारी होने से इनकार किया और मामले की जांच के बाद ही कुछ कहने की बात कही. अब नजरें प्रशासन पर टिकी हैं. क्या दिव्यांशु की यह पुकार सुनी जाएगी या वह भी सिस्टम की फाइलों में कहीं दबकर रह जाएगी? फिलहाल, कहलगांव के उस छोटे से बच्चे की आंखों में एक ही सवाल तैर रहा है-“क्या मैं फिर से स्कूल जा पाऊंगा?”

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By JITENDRA TOMAR

JITENDRA TOMAR is a contributor at Prabhat Khabar.

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