Bihula Vishahari Puja 2026: भागलपुर सहित पूरे अंग क्षेत्र में बिहुला-विषहरी पूजा की पारंपरिक शुरुआत हो गई है. कर्क संक्रांति के बाद लोकगाथा बिहुला-विषहरी से जुड़े अनुष्ठानों के क्रम में शुक्रवार सुबह जिले के 182 विषहरी पूजा स्थलों पर महिलाओं ने पहली और छोटी डलिया चढ़ाकर माता विषहरी की आराधना की. इसके साथ ही उन्होंने अपना उपवास भी समाप्त किया.
शाम होते ही विभिन्न पूजा स्थलों से पारंपरिक बारी कलश शोभायात्रा निकलेगी. इसमें भगत, श्रद्धालु और बड़ी संख्या में महिलाएं शामिल होंगी. पूरे शहर और ग्रामीण इलाकों में धार्मिक और सांस्कृतिक माहौल देखने को मिलेगा.
लोकगाथा से जुड़ी है बिहुला-विषहरी पूजा की परंपरा
अंग प्रदेश की पहचान रही बिहुला-विषहरी पूजा केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि लोकसंस्कृति का महत्वपूर्ण हिस्सा है. यह पूजा सती बिहुला की अमर कथा से जुड़ी हुई है.
मान्यता है कि बिहुला ने अपने सतीत्व, अटूट विश्वास और तपस्या के बल पर इंद्रलोक तक पहुंचकर अपने मृत पति लखिंदर, उनके छह भाइयों और मल्लाहों को पुनर्जीवन दिलाया था. इसी लोकगाथा की स्मृति में भागलपुर, बांका और आसपास के अंग क्षेत्र में हर वर्ष श्रद्धा और उत्साह के साथ बिहुला-विषहरी पूजा आयोजित की जाती है.
गंगा स्नान के बाद शुरू हुए धार्मिक अनुष्ठान
शुक्रवार सुबह दक्षिणी क्षेत्र के डाउदबाट, मेहद्दीनगर, अलीगंज महेशपुर और अन्य क्षेत्रों के भगत एवं महिला श्रद्धालुओं ने गंगा स्नान कर पूजा-अर्चना की.
बरारी रिफ्यूजी क्षेत्र में मिट्टी से बने बारी कलश पर माता विषहरी की आकृति बनाकर पिंडी पर पूजा की गई. वहीं परंपरा के अनुसार कुम्हार के घर से कच्ची मिट्टी का बारी कलश लाया गया. गंगा स्नान के बाद उसमें गंगाजल भरकर विधिवत स्थापना की गई.
शाम को इसी कलश के साथ नगर भ्रमण और शोभायात्रा निकाली जाएगी.
Bihula Vishahari Puja 2026: 17 से 19 अगस्त तक होगा मुख्य आयोजन
पहली डलिया चढ़ाने के बाद अब 17 अगस्त को महिलाएं बड़ी डलिया अर्पित करेंगी. इसके बाद 17 से 19 अगस्त तक बिहुला-विषहरी पूजा का मुख्य आयोजन होगा.
इन तीन दिनों में भागलपुर शहर और ग्रामीण क्षेत्रों के पूजा स्थलों पर धार्मिक अनुष्ठान, पारंपरिक पूजा, लोकगीत और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे. इसके बाद भी लगभग एक महीने तक कई पूजा स्थलों पर माता विषहरी की नियमित पूजा जारी रहेगी.
चंपानगर में दिखी सबसे अधिक श्रद्धालुओं की भागीदारी
चंपानगर स्थित विषहरी मंदिर को इस पूजा का प्रमुख केंद्र माना जाता है. यहां आसपास के 100 से अधिक परिवारों की महिलाओं ने उपवास रखकर पहली डलिया चढ़ाई.
मंदिर में पंडित संतोष झा ने वैदिक विधि-विधान से पूजा कराई. महिलाओं ने डलिया अर्पित करने के साथ पारंपरिक बिहुला-विषहरी गीत भी गाए.
इशाकचक, परबत्ती, बड़ी खंजरपुर, दीपनगर, जोगसर और भीखनपुर सहित कई इलाकों में भी श्रद्धालुओं ने पूरे उत्साह के साथ पूजा-अर्चना की.
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पूजा स्थलों की तैयारियों पर रही समिति की नजर
केंद्रीय पूजा समिति के अध्यक्ष भोला कुमार मंडल, महामंत्री शशिशंक राय, कार्यकारी अध्यक्ष प्रदीप कुमार सहित अन्य पदाधिकारियों ने जिले के सभी प्रमुख पूजा स्थलों की तैयारियों और गतिविधियों की जानकारी ली.
सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि बिहुला-विषहरी पूजा अंग क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान है. यह परंपरा नई पीढ़ी को अपनी लोकसंस्कृति और इतिहास से जोड़ने का महत्वपूर्ण माध्यम भी है.
पूजा के साथ विभिन्न क्षेत्रों में मेले भी लगेंगे, जहां धार्मिक आस्था के साथ स्थानीय संस्कृति और पारंपरिक लोकजीवन की झलक देखने को मिलेगी.
