Sultanganj News: परंपरागत खेती में मौसम की मार और फसलों के अनिश्चित भाव से परेशान रहने वाले किसानों के लिए एक अच्छी खबर सामने आई है. भागलपुर जिले के सुलतानगंज प्रखंड अंतर्गत धांधी-बेलारी पंचायत में खेती का एक ऐसा अनूठा और क्रांतिकारी मॉडल उभरकर सामने आया है, जिसने पारंपरिक कृषि की पूरी परिभाषा ही बदलकर रख दी है. अब यहां के किसान सिर्फ खेत में गेहूं या धान उगाकर मानसून के भरोसे हाथ पर हाथ धरे नहीं बैठते. एक ही खेत से दूध, शुद्ध शहद और जैविक वर्मी खाद तैयार कर किसान हर महीने तगड़ी अतिरिक्त कमाई कर रहे हैं. कृषि विभाग की एक दूरदर्शी योजना ने इस गांव के 33 किसानों की जिंदगी में समृद्धि और आत्मनिर्भरता की नई अलख जगा दी है.
वर्षा आधारित क्षेत्र विकास योजना ने बदली धांधी-बेलारी की किस्मत
वर्ष 2025-26 में कृषि विभाग ने सुलतानगंज प्रखंड में पहली बार वर्षा आधारित क्षेत्र विकास योजना (RAD) को धरातल पर उतारा. इस योजना का मुख्य उद्देश्य सिंचाई के संसाधनों से दूर वर्षा पर निर्भर रहने वाले छोटे और सीमांत किसानों को 'समेकित एवं प्राकृतिक कृषि प्रणाली' से जोड़ना था. योजना के तहत धांधी-बेलारी पंचायत के चयन के बाद 33 उत्साही किसानों को कृषि विभाग द्वारा 30-30 हजार रुपये का प्रत्यक्ष अनुदान दिया गया. इस वित्तीय सहायता और प्रोत्साहन के मिलते ही किसानों ने पारंपरिक फसलों के साथ-साथ दूध उत्पादन, मधुमक्खी पालन और वर्मी कंपोस्ट खाद तैयार करने की गतिविधियों को एक साथ शुरू कर दिया.
खेतों में गूंजने लगी मधुमक्खियों की भनभनाहट, बाजार में छाने लगा शुद्ध शहद
इस पूरी मुहिम में सबसे ज्यादा आकर्षण और सफलता मधुमक्खी पालन से मिली है. प्रखंड कृषि कार्यालय सुलतानगंज की ओर से इन किसानों को वैज्ञानिक तरीके से मधु उत्पादन का विशेष प्रशिक्षण दिलाया गया. प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद किसानों ने अपने खेतों और मेढ़ों पर मधुमक्खी के बक्से स्थापित किए. कुछ ही महीनों के भीतर खेतों में मधुमक्खियों की भनभनाहट गूंजने लगी और अब धांधी-बेलारी का बना शुद्ध प्राकृतिक शहद स्थानीय बाजारों तक पहुंचने लगा है. किसान अब गेहूं और धान की फसल कटने का इंतजार किए बिना ही शहद बेचकर हर हफ्ते अपनी जेब में नगद राशि हासिल कर रहे हैं.
वर्मी खाद और गौपालन से मिट्टी भी सुधरी और लागत भी हुई आधी
इस समेकित मॉडल की दूसरी सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें कुछ भी बेकार नहीं जाता. गौपालन से मिलने वाले गोबर का उपयोग किसान वर्मी खाद (केंचुआ खाद) बनाने में कर रहे हैं. इससे किसानों को अपने खेतों के लिए बाजार से महंगी रासायनिक खादें नहीं खरीदनी पड़ रही हैं, जिससे खेती की लागत आधी हो गई है. साथ ही इस जैविक खाद के प्रयोग से मिट्टी की उर्वरता शक्ति में अभूतपूर्व सुधार आया है. बचे हुए वर्मी कंपोस्ट को अन्य स्थानीय किसानों को बेचकर भी अतिरिक्त आय अर्जित की जा रही है. दूध की बिक्री से मिलने वाला रोज का पैसा परिवार की रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा कर रहा है.
Sultanganj News: स्थानीय प्रभाव और दूसरे किसानों के लिए प्रेरणा का केंद्र
धांधी-बेलारी के किसानों की यह क्रांतिकारी पहल अब पूरे सुलतानगंज क्षेत्र के किसानों के लिए एक जीवित केस स्टडी बन चुकी है. प्रखंड कृषि पदाधिकारी सत्यम राज ने बताया कि आरएडी योजना के तहत किसानों को न केवल 30 हजार रुपये की आर्थिक सहायता दी गई, बल्कि उन्हें लगातार तकनीकी मार्गदर्शन और व्यावहारिक प्रशिक्षण भी उपलब्ध कराया जा रहा है. इस मॉडल की सफलता को देखते हुए आसपास के गांवों के किसान भी अब एक ही फसल पर निर्भर रहने के बजाय समेकित खेती अपनाने के लिए कृषि कार्यालय के चक्कर लगा रहे हैं. यह पहल यह साबित करती है कि अगर सही दिशा, योजना और मेहनत का मेल हो तो कम जमीन में भी कई गुना मुनाफा कमाया जा सकता है.
