भागलपुर : जवाहर लाल नेहरू मेडिकल कॉलेज सह अस्पताल के ओपीडी में जनवरी माह में अस्थमा क्लिनिक खोला गया. दस माह में ही यहां की व्यवस्था चारों खाने चित होने लगा है. बुधवार को क्लिनिक और टीबी विभाग में आने वाले मरीजों का इलाज करने के लिए एक चिकित्सक मौजूद थे.
मरीजों की भीड़ इतनी थी की डॉक्टर परेशान थे कि अस्थमा का इलाज पहले करें या टीबी का. दिलचस्प बात यह है कि दोनों विभाग में आधे दर्जन डॉक्टर तैनात हैं. इनके वेतन में करीब 15 लाख रुपये का खर्च सरकार को प्रति माह आता है. आज टीबी विभाग के वरीय चिकित्सा प्रभारी डॉ अमित आनंद छुट्टी पर थे.
जबकि अस्थमा क्लिनिक का भार डॉ डीपी सिंह, डॉ शांतनु घोष, डॉ अजय कुमार और डॉ धीरज, डॉ मनीष कुमार के कंधे पर है. इस दोनों विभाग के ओपीडी में कम से कम दो चिकित्सक का रहना जरूरी था. जिससे मरीजों का इलाज बेहतर तरीके से हो सके. मौसम अभी अस्थमा का है अस्पताल में मरीजों की संख्या बढ़ रही है.
टीबी विभाग में दवा, कर्मी के साथ मरीज की इंट्री कर रही थी नर्स : ओपीडी के टीबी रोग विभाग में दवा के साथ कर्मी मौजूद थे. उधर, नर्स मरीजों का इंट्री करने में लगी थी. जब भीड़ ज्यादा हो जा रहा था तो अस्थमा क्लिनिक में बैठे डॉ धीरज को नर्स बुला कर लाती या मरीज को उनके पास भेज देती थी.
इससे मरीज परेशान होते रहे. इस वजह से कई मरीज बिना डॉक्टर को दिखाये वापस हो गये. मरीजों ने कहा कि भीड़ इतनी है कि टीबी के बदले अगर डॉक्टर ने अस्थमा की दवा लिख दिया, तो लेने के देने पड़ सकते हैं. बुधवार को टीबी रोग विभाग में दोपहर साढ़े बाहर बजे तक 73 मरीजों को देखा गया. इन सभी का इलाज डॉ धीरज कुमार ने ही किया.
अस्थमा क्लिनिक से एक को छोड़ सभी डॉक्टर थे गायब : अस्थमा क्लिनिक में आधे दर्जन डॉक्टर की तैनाती है. सोमवार क्लिनिक में एक बजे तक 30 मरीज इलाज के लिए आये. टीबी और अस्थमा के मरीज एक साथ एक कमरे में आ रहे थे.
मरीजों ने कहा कि अस्थमा क्लिनिक के बाहर शहर के बड़े-बड़े डॉक्टर का नाम लिखा है. इलाज कराने आये तो यहां डॉक्टर गायब थे. अब बिना अनुभवी डॉक्टर के यह क्लिनिक किस काम का है. वहीं, डॉ धीरज ने बताया कि जो भी मरीज आ रहे हैं सभी का इलाज किया जा रहा है.
इलाज और जांच के बाद मिलती है यहां सप्ताह में दो दिन दवा :अस्थमा क्लिनिक में आने वाले मरीजों को अगर दवा की जरूरत होती है तो सप्ताह में दो दिन उपलब्ध करायी जाती है. यहां दवा मंगलवार और शुक्रवार को मिलती है. बाकी दिन मरीज आते हैं, तो उनका इलाज तो हो जाता है, लेकिन दवा के लिए इंतजार करना पड़ता है.
