कुछ तो रहम करें

25 नवंबर : कक्षा चार के बच्चे हिंदी नहीं पढ़ पाते, आत्मग्लानि की बात है : डीएम 26 नवंबर : पढ़ाने देंगे तब ना, फाइल तो बनवाते हैं : शिक्षक संघ 27 नवंबर : कहीं नहीं थे बच्चे, तो कहीं समय से पहले लग गया था ताला (स्कूलों की पड़ताल) 01 दिसंबर : अतिक्रमण हटाने […]

  • 25 नवंबर : कक्षा चार के बच्चे हिंदी नहीं पढ़ पाते, आत्मग्लानि की बात है : डीएम
  • 26 नवंबर : पढ़ाने देंगे तब ना, फाइल तो बनवाते हैं : शिक्षक संघ
  • 27 नवंबर : कहीं नहीं थे बच्चे, तो कहीं समय से पहले लग गया था ताला (स्कूलों की पड़ताल)
  • 01 दिसंबर : अतिक्रमण हटाने में बाधा डाले तो प्राथमिकी करें, बैंक-स्कूल आवंटन विवाद को निबटायें : कमिश्नर
जीवेश रंजन सिंह : बीते हफ्ते प्रभात खबर के भागलपुर संस्करण में प्रकाशित ये चार खबरें बानगी भर हैं. वर्तमान व्यवस्था, बिखरते सामाजिक तानाबाना, खास कर कर्तव्य के प्रति घोर लापरवाह मानस का यह उदाहरण भर है. ये खबरें भले भागलपुर के संदर्भ में हों, पर एक नजर डाल कर आप अपने आसपास देखें कमोबेस यही स्थिति दिखेगी.
संदर्भवश हाल के दिनों में विभागीय कामकाज के तहत भागलपुर के आयुक्त, जिलाधिकारी, एसएसपी आदि ने लगातार अपने विभिन्न विभागों का निरीक्षण किया. हर जगह कमी दिखी, जगह-जगह फटकार लगी, सुधरने की चेतावनी दी गयी, पर बदलाव क्या हुआ यह शुक्रवार को कमिश्नर की बैठक से साफ हो गया. कमिश्नर ने भी स्वीकारा कि कहीं कोई अपेक्षित सुधार नहीं दिखा. पुन: एक माह का समय उनको देना पड़ा सभी चीजों को ठीक करने के लिए.
अगर आप प्रशासनिक व्यवस्था को पिरामिड की शक्ल दें तो सबसे ऊपर कमिश्नर साहब दिखते हैं. ऐसा अधिकारी अगर स्वीकार करता है कि उसकी चेतावनी व सुझाव पर अपेक्षित कार्रवाई नहीं हो रही, तो ऐसी व्यवस्था में आम आदमी की स्थिति की कल्पना की जा सकती है. हालत यह है कि स्कूलों में पढ़ाई नहीं कार्यालयों में बाबुओं की मनमानी और कुछ कहने-सुनने की कतई गुंजाइश नहीं के माहौल में सब चल रहा. हालांकि कुछ अपवाद भी हैं, पर उनकी संख्या रोज कमतर होती जा रही. यह सुखद संकेत नहीं.
प्रभात खबर ने बीते हफ्ते स्कूलों और प्रखंड कार्यालयों की पड़ताल की थी. जिन स्कूलों की पड़ताल की गयी थी वो शहर की थीं. वहां की व्यवस्था जब लचर थी तो ग्रामीण इलाकों के स्कूलों की स्थिति का अंदाजा लगाया जा सकता है. शिक्षकों की अपनी कई समस्याएं हैं, कई विकट परिस्थितियों से उन्हें गुजरना पड़ता है, पर क्या गुरुजी लोग या उनके संगठन के कर्ता-धर्ता यह सोचेंगे कि उनकी समस्याओं से उनके यहां आनेवाले बच्चों या उनके अभिभावकों का क्या लेना-देना.
वो तो इस आस में अपने बच्चों को भेजते हैं कि उनके बच्चे अच्छे इंसान बन कर निकलेंगे. फिर उनके साथ धोखा क्यों. आप लड़ें अपनी लड़ाई, पर कर्तव्य की बात की चर्चा के बाद अधिकार की बात हो तब तसवीर और तकदीर बदलेगी. कुछ ऐसी ही स्थिति प्रखंड कार्यालयों की थी. अधिकतर में साहब नदारत थे. जिन पर पूरे प्रखंड की जवाबदेही, वही गायब. यह नियम है कि साहबों को अपने प्रखंड में ही रहना है, जांच लें सच इसके विपरीत होगा. पर इस पर कोई सवाल-जवाब नहीं होता, भले रोज कोसों दूर से पैदल आकर आम आदमी लौटे, साहबों की गाड़ी तो फर्राटे भरती ही रहेगी.
तबाह हो रहे किसान
आज अन्नदाता परेशान हैं. धान नहीं हुआ, गेहूं की खेती पर संकट है. विभाग ने भी गेहूं की खेती नहीं करने की सलाह दी है. पर अंतिम समय में किसान क्या करे. विभाग के पास उतने आदमी नहीं जो उनकी समस्या का तत्काल समाधान हो. प्रखंड कार्यालयों व कृषि विभाग की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है, क्या इस पर कोई मंथन होगा.
ऐसे में कैसे होगा
भागलपुर के स्मार्ट सिटी बनने की घोषणा के ढाई साल बीत चुके हैं. पर यहां विकास का काम ब्लैक बॉक्स में है. जब-तब बैठकें होती हैं और विकास के बॉक्स से घोषणा का एक जिन्न निकलता है, कुछ हलचल होती है और फिर सब शांत. सहरसा में रोज जाम से परेशान लोग रेल पुल की मांग कर आंदोलन करते हैं, पर जब तक आंदोलन चलता है, घोषणावीर आगे आने लगते हैं, कोई पटना बात करता है, तो कोई दिल्ली, पर आंदोलन शांत होते सब शांत.
कुछ ऐसी ही चर्चा है खगड़िया और सहरसा को जोड़नेवाले डुमरी पुल की. वर्षों मरम्मत के नाम पर बंद रहने के बाद हाल ही में छोटे वाहनों के लिए खोला गया, पर एक दिन में ही पुल हिलने लगा, फिर बंद हो गया. तरह-तरह के आरोप-प्रत्यारोप लगे और अब फिर दावा है कि जल्द पुल चालू हो जायेगा.
शर्मनाक तो यह कि केंद्रीय मंत्री खगड़िया आती हैं और बहुप्रतीक्षित मेगा फुड पार्क का बिना उद्घाटन किये चली जाती हैं. सिर्फ जाती ही नहीं बल्कि खुले मंच से यह भी कहती हैं कि बिना काम किये उनसे कोई उद्घाटन नहीं करा सकता. पूरे देश में यह संदेश गया कि खगड़िया में काम के नाम पर सरकारी पदाधिकारियों ने आइवाश करने की कोशिश की पर उनकी चोरी तेजतर्रार केंद्रीय मंत्री हरसिमरत कौर ने पकड़ ली. काम केंद्र का था या राज्य का यह मायने नहीं रखता, मायने यह रखता है कि हमारी नाक कटी.
और अंत में
चुनावी माहौल बनता जा रहा है. रंग-बिरंगी बंडियों की चमक दिखने लगी है. बाबुओं की हलचल भी बढ़ी है. पर अब भी कर्तव्य की जगह अधिकार और सबसे ज्यादा कामकाजी होने के दावे ज्यादा हैं. महात्मा गांधी के 10 सूत्र में एक यह भी था : अधिकार-प्राप्ति का उचित माध्यम कर्तव्यों का निर्वाह है. क्या इस पर हम सोचेंगे.

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